भगवान महावीर और मेघकुमार के बीच के संवाद -
मेघ बोला - प्रभो ! आपका प्रसाद प्राप्त कर मेरा मन पुलकित हो उठा |
आपकी सुधारस से सिक्त वाणी मनुष्यों के संताप का हरण कर लेती है |
गुरु -
जन्म से मृत्यु तक कोई न कोई कुछ न कुछ सिखाता है,
पर वे सांसारिक गुरु होते हैं |
अध्यात्म की दुनिया के गुरु हमें अपनी आत्मा के कल्याण के गुर सिखाते हैं |
मंदिर में प्राप्त होने वाला प्रसाद स्थूल है
और गुरु सानिध्य में प्राप्त होने वाला भिन्न है |
यह सीधा और शीघ्र प्रभावकारी होता है |
' गुरु ' शब्द में ही कुछ विशिष्टता है,
उस विशिष्टता से युक्त व्यक्ति ही गुरु होता है |
जो ' गु ' अन्धकार से
' रु ' प्रकाश की ओर ले जाए वह गुरु होता है |
' गु ' अर्थात ग्रंथातीत और
' रु ' अर्थात रूपातीत -
जो शिष्य का तीन गुणों व् नाम-रूप के मिथ्या जगत से सम्यग बोध देकर मुक्ति की ओर अग्रसर करता है,
वह गुरु होता है |
मेघ बोला - प्रभो ! आपका प्रसाद प्राप्त कर मेरा मन पुलकित हो उठा |
आपकी सुधारस से सिक्त वाणी मनुष्यों के संताप का हरण कर लेती है |
गुरु -
जन्म से मृत्यु तक कोई न कोई कुछ न कुछ सिखाता है,
पर वे सांसारिक गुरु होते हैं |
अध्यात्म की दुनिया के गुरु हमें अपनी आत्मा के कल्याण के गुर सिखाते हैं |
मंदिर में प्राप्त होने वाला प्रसाद स्थूल है
और गुरु सानिध्य में प्राप्त होने वाला भिन्न है |
यह सीधा और शीघ्र प्रभावकारी होता है |
' गुरु ' शब्द में ही कुछ विशिष्टता है,
उस विशिष्टता से युक्त व्यक्ति ही गुरु होता है |
जो ' गु ' अन्धकार से
' रु ' प्रकाश की ओर ले जाए वह गुरु होता है |
' गु ' अर्थात ग्रंथातीत और
' रु ' अर्थात रूपातीत -
जो शिष्य का तीन गुणों व् नाम-रूप के मिथ्या जगत से सम्यग बोध देकर मुक्ति की ओर अग्रसर करता है,
वह गुरु होता है |
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