पृथ्वी तत्व
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पृथ्वी तत्व का स्थान है - शक्ति केंद्र
( मूलाधार चक्र ) |
अस्थि, मांस, त्वचा, रोम और रक्तवाहिनियां - -
इन पांचों का पृथ्वी तत्व से सम्बन्ध है |
कनिष्ठा अंगुली को अंगूठे से दबाने पर
शरीर में पृथ्वी तत्व का संतुलन होता है |
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यकृत, आमाशय और प्लीहा पर इस तत्व का नियंत्रण है |
इसकी अधिकता से कफ़, श्वास में भारीपन, आलस्य,
उल्टी, पेट में कृमि और चक्षु रोग आदि होते हैं |
यह तत्व यदि पूर्ण रूप से संतुलित हों तो
व्रण, चमड़ी, हड्डी - सब ठीक हो जाते हैं |
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२१ दिसंबर से २० मार्च तक शरीर में पृथ्वी तत्व की
प्रधानता रहती है |
- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी
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पृथ्वी तत्व का स्थान है - शक्ति केंद्र
( मूलाधार चक्र ) |
अस्थि, मांस, त्वचा, रोम और रक्तवाहिनियां - -
इन पांचों का पृथ्वी तत्व से सम्बन्ध है |
कनिष्ठा अंगुली को अंगूठे से दबाने पर
शरीर में पृथ्वी तत्व का संतुलन होता है |
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यकृत, आमाशय और प्लीहा पर इस तत्व का नियंत्रण है |
इसकी अधिकता से कफ़, श्वास में भारीपन, आलस्य,
उल्टी, पेट में कृमि और चक्षु रोग आदि होते हैं |
यह तत्व यदि पूर्ण रूप से संतुलित हों तो
व्रण, चमड़ी, हड्डी - सब ठीक हो जाते हैं |
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२१ दिसंबर से २० मार्च तक शरीर में पृथ्वी तत्व की
प्रधानता रहती है |
- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी
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जल तत्व
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जल तत्व का स्थान है -
स्वास्थ्य केंद्र ( स्वाधिष्ठान चक्र )
कान, सिर के बाल और हड्डियों में
जलीय परमाणुओं की विद्दमानता है |
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अनामिका अंगुली को अंगूठे से दबाने पर
शरीर में जलतत्व का संतुलन होता है |
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आंसू, कफ़, थूक, रक्त, प्रस्वेद, श्लेष्म आदि
पर इस तत्व का नियंत्रण है |
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इसकी अधिकता से गैस, ह्रदय पर असर,
मुख फीका, हकलाना, चमड़ी में कम्पन आदि रोग होते हैं |
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इस तत्व पर नियंत्रण होने से भूख-प्यास शांत होती है और
मैत्री का विपाक होता है |
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२१ मार्च से २० जून तक शरीर में जल तत्व की प्रधानता रहती है |
- आचार्य श्री महाप्रज्ञजी
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