अलग- अलग घेरों में पलती ज़िन्दगी -
कुछ माता-पिता अपने बच्चों को अपनी ज़िन्दगी का अन्तरंग हिस्सा नहीं बनाते |
उनका जीवन अपने लिए होता है |
बच्चों को अपनी प्राइवेसी में बाधक मानते हैं |
इसलिए समय भी कम देते हैं,
ऐसे लोग आर्थिक दृष्टि से संपन्न भी होते हैं |
वे बच्चों की जायज-नाजायज़ मांगों को पूरा कर देते हैं |
जीवन के यथार्थ से उनको परिचित नहीं कराते,
जीवन कैसे जीया जाता है ?
पारिवारिक संबंधों में मधुरता कैसे आती है ?
बड़ों के प्रति कर्तव्यों का निर्वाह कैसे होता है ?
छोटो को कैसे साथ लेकर चलना ?
मित्रों और परिचितों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए ?
केवल अपने बारे में सोचने वाले माता-पिता अपने बच्चों को न जीवन का बोध दे सकते हैं
और न सामजिक बना सकते हैं |
एक बच्ची ब्रेकफास्ट करने आई
मनचाहा नाश्ता नहीं मिला, वह उठकर चली गयी
और अपने कमरे में जाकर सो गयी
परिवार के लोगों में, यहाँ तक कि उसकी माँ में भी हिम्मत नहीं कि वह अपनी लाडली बेटी के रूठने का कारण भी पूछे,
ऐसी हरकत के लिए डांटने का तो प्रश्न ही नहीं उठता |
सब को भय है कि डांट सहन न कर पाने से बच्ची कोई गलत कदम न उठा ले |
बच्चा हो या बच्ची हो, इतनी असहिष्णुता में परिवार के साथ समरस होने की कल्पना ही नहीं की जा सकती |
ऐसी दशा में युवा वर्ग के मादक पदार्थों और व्यसनों की तरफ जाने की संभावना बढ़ जाती है |
No comments:
Post a Comment