साम्प्रदायिकता का ज़हर !!! - १
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६ दिसंबर १९९२ !
भारतीय इतिहास का अविस्मरणीय दिन बन गया है |
रामजन्मभूमि पर राममंदिर का दावा करनेवाले युवकों
ने न्याय और कानून की धज्जियां उड़ाते हुए विवादग्रस्त
ढाँचे को ढहा दिया |
पुरे देश में उत्तेजना का माहौल बन गया,
साम्प्रदायिक सौहार्द को खतरा बन गया |
साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे |
देश हिंसा की आग में झुलस उठा |
हज़ारों लोग मारे गए |
जान-माल की भारी क्षति हुई |
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हिन्दू संस्कृति सदैव प्रेम, भाईचारे एवं सौहार्द की भावना से अनुप्राणित रही है |
मुस्लिम संस्कृति ने भी बंधुत्व एवं भाईचारे की भावना को मूल्य दिया है |
दोनों संस्कृतियों के ये मूल्य आज कसौटी पर चढ़े हुए हैं |
क्या ये मूल्य सुरक्षित रह पाएंगे ?
इन मूल्यों को कैसे पल्लवित और पुष्पित बनाया जाए ?
यदि ये मूल्य नहीं रह पाए तो
क्या भारत भारत रह पाएगा ?
क्या उसकी अस्मिता को खतरा पैदा नहीं हो जाएगा ?
भारतीय संस्कृति प्रेम, साप्रदायिक सौहार्द एवं समन्वय की
संस्कृति रह पाएगी ?
क्या उसका गौरवपूर्ण अतीत वर्तमान में यह प्रश्न नहीं कर रहा है - -
भारत का भविष्य उसके उज्जवल अतीत को प्रदीप्त बनाएगा ?
क्या वर्तमान अतीत को भूला देगा या
उज्जवल भविष्य का संकेत बनेगा ?
ऐसे अनगिनत प्रश्न आज प्रत्येक प्रबुद्ध मानस में उभर रहे हैं |
वह देश की वर्तमान स्थिति से चिंतित है |
समस्या उग्र बन रही है |
समाधान की तलाश जारी है,
पर समाधान अभी भी सपना बना हुआ है |
राजनीतिज्ञ इस समस्या को समाहित नहीं सकते |
उनके सामने चुनाव का जटिल प्रश्न है |
उन्हें जीतने के लिए वोट की शक्ति चाहिए |
वोट और सत्ता का मोह उनके विवेक को जकड़े हुए हैं |
उनसे किसी समाधान की आशा नहीं की जा सकती |
- "महाप्रज्ञ : जीवन-दर्शन..पृष्ठ संख्या - १११" से
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साम्प्रदायिकता का ज़हर - २
आप व्यास और मैं गणपति !!!
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एक दिन 'जनसत्ता' के संपादक श्री प्रभाष जोशी आये और बोले -
आचार्यजी ! आज देश सामुदायिक दावानल में झुलस रहा है |
आग को शांत करने के लिए आप जैसे असाम्प्रदायिक दृष्टि
वाले धर्म-गुरुओं के मार्गदर्शन की जरुरत है,
जिनके मन-मस्तिष्क में मानव मात्र के कल्याण की
कामना सदा उभरती रहती है |
आचार्यजी ! आज पूरा देश आपकी ओर आशाभरी नज़रों से देख रहा है |
इन क्षणों में देश के लिए साम्प्रदायिक विद्वेष की आग को शांत करने के लिए
आपके प्रयत्न बहुत मूल्यवान बन सकते हैं |
आप मेरी इस प्रार्थना को स्वीकार करें,
देश को इस कठिन समय में राह दिखाएं |
इस समय आपको ऐसा सन्देश देना चाहिए,
जिससे देश का प्रत्येक नागरिक अपने कर्त्तव्य के प्रति जागरूक बने |
वैर-विरोध की नहीं,
मैत्री, करुणा और भाईचारे की धारा बह चले |
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पूज्य गुरुदेव श्री तुलसी ने प्रभाष जोशी की भावना को सुना |
ऐसा लग रहा था प्रभाष जोशी नहीं बोल रहे हैं,
उनका ह्रदय बोल रहा है, देश की चिंता बोल रही है |
वे एक ओर देश की दशा से चिंतित थे तो
दूसरी ओर गुरुदेव की उपस्थिति से आश्वस्त भी थे |
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प्रभाष जोशी की इस समयोचित सूझ-बूझ को पूज्य गुरुदेव ने स्वीकार कर लिया |
उसी समय महाप्रज्ञजी से देश की जनता के नाम शांति-सन्देश लिखने का निर्देश दिया |
महाप्रज्ञजी गुरुदेव तुलसी की भाष्यकार के रूप में विश्रुत हैं |
वे गुरुदेव की भावना को आकार देते रहे हैं |
गुरु का निर्देश मिलते ही महाप्रज्ञजी आशुवक्तव्य के लिए प्रस्तुत हो गए |
- "महाप्रज्ञ : जीवन-दर्शन..पृष्ठ संख्या - १११" से
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साम्प्रदायिकता का ज़हर - ३
आप व्यास और मैं गणपति - २
एक मुनिजी कलम एवं कागज़ लेकर सन्नद्ध हुए |
पर श्री प्रभाष जोशी बोले -
मुनिजी ! मैं लिख लूंगा |
पूज्य गुरुदेव ने कहा -
जोशीजी ! आप क्या करेंगे ?
प्रभाष जोशी ने अत्यंत विनम्रता से आग्रह किया -
आचार्यश्री ! आज महाप्रज्ञजी बोलेंगे और मैं लिखूंगा |
महाप्रज्ञजी ! आप व्यास हैं और मैं आपका गणपति |
प्रभाष जोशी भावपूर्ण स्वरों में यह कहते हुए लिखने की
मुद्रा में बैठ गए -
" मैं गणपति, तू व्यास "
प्रभाष जोशी ने ये शब्द जिस आतंरिक श्रद्धा और आदर से
महाप्रज्ञजी से कहे,
उसे सुनकर वहां बैठा प्रत्येक व्यक्ति भाव-विभोर हो उठा |
वह व्यक्ति जो जैन नहीं है,
प्रबुद्ध पत्रकार है,
देश के विशिष्ट पत्र का सम्पादक है,
महाप्रज्ञजी का गणपति बनने में गौरव की अनुभूति करता है,
महाप्रज्ञजी द्वारा दिए जाने वाले सन्देश का
लिपिकार बनने में आह्लादित होता है |
महाप्रज्ञजी देश के नाम गुरुदेव का सन्देश देते चले गए और
प्रभाष जोशी लिखते चले गए |
सन्देश -
मंदिर और मस्जिद को लेकर जो स्थिति उत्पन्न हुई है,
वह प्रत्येक चिंतनशील व्यक्ति के लिए
मानसिक पीड़ा उत्पन्न करने वाली है |
यह प्रश्न केवल मंदिर और मस्जिद का नहीं,
यह प्रश्न दो बड़ी धाराओं के बीच का है,
जिन्हें एक ही राष्ट्र में साथ-साथ जीना और सांस लेना है |
यदि यह संघर्ष आगे बढ़ता है तो
सैकड़ों वर्षों तक विष-बीज अंकुरित होते रहेंगे और
उनके कड़वे फल राष्ट्र जीवन को विषाक्त बनाते रहेंगे |
-----------------
इस अवसर को हम बदल सकें,
शांतिपूर्ण समझौते में परिणत कर सकें तो
हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष की स्थिति सदा के लिए मिट सकती है |
फिर एक-दुसरे के आमने-सामने आने की स्थिति नहीं बने;
इसके लिए हमें एक नया प्रयत्न शुरू करना चाहिए |
यह प्रयत्न सरकार या राजनीति के स्तर पर नहीं,
तटस्थ दृष्टि वाले धर्म-गुरुओं, चिंतकों और शान्ति
की कामना करने वाले समाजसेवकों के द्वारा होना चाहिए |
--------------------
रामजन्मभूमि के लिए चले आन्दोलन का जो परिणाम आया है,
उसे देखते हुए धर्मगुरुओं का दायित्व और अधिक बढ़ गया है |
साम्प्रदायिक सौहार्द, सदभाव और समन्वय की प्यास और अधिक
गहरी हो गई है |
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धर्म के नाम पर घृणा, साम्प्रदायिकता और विद्वेष का जो वातावरण फैला है,
उसके मूल में धर्मनेता और राजनेता के स्वार्थ और अहंकार जुड़े हुए हैं |
अपने स्वार्थ एवं अहं की पूर्ति के लिए वे भोली-भाली धर्मांध जनता को आगे कर देते हैं |
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साम्प्रदायिक उन्माद से भरे घोष एवं नारों का ऐसा मायाजाल रचते हैं कि
सामान्य जनता उसमें फंस जाती है |
दो-चार व्यक्तियों का संघर्ष साम्प्रदायिकता की चिंगारी सुलगा देता है |
दो-चार स्वार्थी व्यक्ति उसमें इंधन डाल देते हैं |
धर्मांध जनता उसे चिरजीवी बना देती है |
- "महाप्रज्ञ : जीवन-दर्शन..पृष्ठ संख्या - १११" से
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साम्प्रदायिकता का ज़हर !!! - ४
आग
पहले ही सुलग गई थी
अब
वह फ़ैल चुकी है
दिग-दिगंत के हर विवर में
हर कोने में
उसे
सुलगाया
सोने वालों ने
उसे
सहलाया
अपनी आँखों को
हलका करने के लिए
रोने वालों ने |
- "महाप्रज्ञ : जीवन-दर्शन..पृष्ठ संख्या - १११" से
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साम्प्रदायिकता का ज़हर !!!- ५
साम्प्रदायिक कट्टरता का मूल बीज है - घृणा |
उसका अंकुर है - -
धर्म खतरे में है - का नारा |
चिंतन की गहराई में जाने पर अनुभव होता है कि
साम्प्रदायिकता कोई मूल समस्या नहीं है |
हम मूल समस्या को नहीं देख रहे हैं |
यदि साम्प्रदायिकता समस्या होती तो
उसे विचार के स्तर पर सुलझाया जा सकता था |
किन्तु जब विचारों की भिन्नता सिरदर्द नहीं है
तो विचार के स्तर पर उसकी पीड़ा को कैसे समाप्त किया जा सकेगा ?
-------------------
साम्प्रदायिक वे हैं,
जो दूसरों को तोड़ने की नीति पर चलते हैं |
दूसरों को तोड़ने की नीति का नाम है - -
साम्प्रदायिकता |
- "महाप्रज्ञ : जीवन-दर्शन..पृष्ठ संख्या - १११" से
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साम्प्रदायिकता का ज़हर !!!- ६
इसका समाधान हम खोजना चाहते हैं तो
गंभीर चिंतन होना आवश्यक है |
आवश्यक तो यह भी है कि
धर्म, राजनीति और जाति का एकीकरण न हो,
पर यह वैचारिक स्वतंत्रता का प्रश्न है,
इसलिए यह कहना मेरे लिए कठिन है कि
ऐसा कोई न माने |
ऐसा मान लेने पर प्रलोभन और बल की नींव को
कमज़ोर में सफल होते हैं तो
हमारी समस्या का खम्भा हिल जाता है |
-------------------
साम्प्रदायिक दंगे कट्टरपंथी लोग भड़काते हैं |
यह आज के शिष्ट समाज के लिए सचमुच लज्जा की बात है |
क्या ऐसा नहीं हो सकता कि
सांप्रदायिक समस्याओं के समाधान के लिए भी कोई
शक्तिशाली मंच बने और
वहां बैठकर सभी एक साथ बैठकर साम्प्रदायिकता से
उपजने वाली समस्याओं पर विचार करें और
उनका समाधान खोजें |
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यदि ऐसा होता है तो
शताब्दियों से बोए गए घृणा के बीज विद्वेषमूलक
भावना को समाप्त कर मानव समाज को विचार के स्तर
पर स्वतंत्र और भिन्न मानते हुए भी भावना के स्तर पर
उसकी एकात्मकता को देखा जा सकता है |
- "महाप्रज्ञ : जीवन-दर्शन..पृष्ठ संख्या - १११" से
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६ दिसंबर १९९२ !
भारतीय इतिहास का अविस्मरणीय दिन बन गया है |
रामजन्मभूमि पर राममंदिर का दावा करनेवाले युवकों
ने न्याय और कानून की धज्जियां उड़ाते हुए विवादग्रस्त
ढाँचे को ढहा दिया |
पुरे देश में उत्तेजना का माहौल बन गया,
साम्प्रदायिक सौहार्द को खतरा बन गया |
साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे |
देश हिंसा की आग में झुलस उठा |
हज़ारों लोग मारे गए |
जान-माल की भारी क्षति हुई |
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हिन्दू संस्कृति सदैव प्रेम, भाईचारे एवं सौहार्द की भावना से अनुप्राणित रही है |
मुस्लिम संस्कृति ने भी बंधुत्व एवं भाईचारे की भावना को मूल्य दिया है |
दोनों संस्कृतियों के ये मूल्य आज कसौटी पर चढ़े हुए हैं |
क्या ये मूल्य सुरक्षित रह पाएंगे ?
इन मूल्यों को कैसे पल्लवित और पुष्पित बनाया जाए ?
यदि ये मूल्य नहीं रह पाए तो
क्या भारत भारत रह पाएगा ?
क्या उसकी अस्मिता को खतरा पैदा नहीं हो जाएगा ?
भारतीय संस्कृति प्रेम, साप्रदायिक सौहार्द एवं समन्वय की
संस्कृति रह पाएगी ?
क्या उसका गौरवपूर्ण अतीत वर्तमान में यह प्रश्न नहीं कर रहा है - -
भारत का भविष्य उसके उज्जवल अतीत को प्रदीप्त बनाएगा ?
क्या वर्तमान अतीत को भूला देगा या
उज्जवल भविष्य का संकेत बनेगा ?
ऐसे अनगिनत प्रश्न आज प्रत्येक प्रबुद्ध मानस में उभर रहे हैं |
वह देश की वर्तमान स्थिति से चिंतित है |
समस्या उग्र बन रही है |
समाधान की तलाश जारी है,
पर समाधान अभी भी सपना बना हुआ है |
राजनीतिज्ञ इस समस्या को समाहित नहीं सकते |
उनके सामने चुनाव का जटिल प्रश्न है |
उन्हें जीतने के लिए वोट की शक्ति चाहिए |
वोट और सत्ता का मोह उनके विवेक को जकड़े हुए हैं |
उनसे किसी समाधान की आशा नहीं की जा सकती |
- "महाप्रज्ञ : जीवन-दर्शन..पृष्ठ संख्या - १११" से
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साम्प्रदायिकता का ज़हर - २
आप व्यास और मैं गणपति !!!
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एक दिन 'जनसत्ता' के संपादक श्री प्रभाष जोशी आये और बोले -
आचार्यजी ! आज देश सामुदायिक दावानल में झुलस रहा है |
आग को शांत करने के लिए आप जैसे असाम्प्रदायिक दृष्टि
वाले धर्म-गुरुओं के मार्गदर्शन की जरुरत है,
जिनके मन-मस्तिष्क में मानव मात्र के कल्याण की
कामना सदा उभरती रहती है |
आचार्यजी ! आज पूरा देश आपकी ओर आशाभरी नज़रों से देख रहा है |
इन क्षणों में देश के लिए साम्प्रदायिक विद्वेष की आग को शांत करने के लिए
आपके प्रयत्न बहुत मूल्यवान बन सकते हैं |
आप मेरी इस प्रार्थना को स्वीकार करें,
देश को इस कठिन समय में राह दिखाएं |
इस समय आपको ऐसा सन्देश देना चाहिए,
जिससे देश का प्रत्येक नागरिक अपने कर्त्तव्य के प्रति जागरूक बने |
वैर-विरोध की नहीं,
मैत्री, करुणा और भाईचारे की धारा बह चले |
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पूज्य गुरुदेव श्री तुलसी ने प्रभाष जोशी की भावना को सुना |
ऐसा लग रहा था प्रभाष जोशी नहीं बोल रहे हैं,
उनका ह्रदय बोल रहा है, देश की चिंता बोल रही है |
वे एक ओर देश की दशा से चिंतित थे तो
दूसरी ओर गुरुदेव की उपस्थिति से आश्वस्त भी थे |
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प्रभाष जोशी की इस समयोचित सूझ-बूझ को पूज्य गुरुदेव ने स्वीकार कर लिया |
उसी समय महाप्रज्ञजी से देश की जनता के नाम शांति-सन्देश लिखने का निर्देश दिया |
महाप्रज्ञजी गुरुदेव तुलसी की भाष्यकार के रूप में विश्रुत हैं |
वे गुरुदेव की भावना को आकार देते रहे हैं |
गुरु का निर्देश मिलते ही महाप्रज्ञजी आशुवक्तव्य के लिए प्रस्तुत हो गए |
- "महाप्रज्ञ : जीवन-दर्शन..पृष्ठ संख्या - १११" से
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साम्प्रदायिकता का ज़हर - ३
आप व्यास और मैं गणपति - २
एक मुनिजी कलम एवं कागज़ लेकर सन्नद्ध हुए |
पर श्री प्रभाष जोशी बोले -
मुनिजी ! मैं लिख लूंगा |
पूज्य गुरुदेव ने कहा -
जोशीजी ! आप क्या करेंगे ?
प्रभाष जोशी ने अत्यंत विनम्रता से आग्रह किया -
आचार्यश्री ! आज महाप्रज्ञजी बोलेंगे और मैं लिखूंगा |
महाप्रज्ञजी ! आप व्यास हैं और मैं आपका गणपति |
प्रभाष जोशी भावपूर्ण स्वरों में यह कहते हुए लिखने की
मुद्रा में बैठ गए -
" मैं गणपति, तू व्यास "
प्रभाष जोशी ने ये शब्द जिस आतंरिक श्रद्धा और आदर से
महाप्रज्ञजी से कहे,
उसे सुनकर वहां बैठा प्रत्येक व्यक्ति भाव-विभोर हो उठा |
वह व्यक्ति जो जैन नहीं है,
प्रबुद्ध पत्रकार है,
देश के विशिष्ट पत्र का सम्पादक है,
महाप्रज्ञजी का गणपति बनने में गौरव की अनुभूति करता है,
महाप्रज्ञजी द्वारा दिए जाने वाले सन्देश का
लिपिकार बनने में आह्लादित होता है |
महाप्रज्ञजी देश के नाम गुरुदेव का सन्देश देते चले गए और
प्रभाष जोशी लिखते चले गए |
सन्देश -
मंदिर और मस्जिद को लेकर जो स्थिति उत्पन्न हुई है,
वह प्रत्येक चिंतनशील व्यक्ति के लिए
मानसिक पीड़ा उत्पन्न करने वाली है |
यह प्रश्न केवल मंदिर और मस्जिद का नहीं,
यह प्रश्न दो बड़ी धाराओं के बीच का है,
जिन्हें एक ही राष्ट्र में साथ-साथ जीना और सांस लेना है |
यदि यह संघर्ष आगे बढ़ता है तो
सैकड़ों वर्षों तक विष-बीज अंकुरित होते रहेंगे और
उनके कड़वे फल राष्ट्र जीवन को विषाक्त बनाते रहेंगे |
-----------------
इस अवसर को हम बदल सकें,
शांतिपूर्ण समझौते में परिणत कर सकें तो
हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष की स्थिति सदा के लिए मिट सकती है |
फिर एक-दुसरे के आमने-सामने आने की स्थिति नहीं बने;
इसके लिए हमें एक नया प्रयत्न शुरू करना चाहिए |
यह प्रयत्न सरकार या राजनीति के स्तर पर नहीं,
तटस्थ दृष्टि वाले धर्म-गुरुओं, चिंतकों और शान्ति
की कामना करने वाले समाजसेवकों के द्वारा होना चाहिए |
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रामजन्मभूमि के लिए चले आन्दोलन का जो परिणाम आया है,
उसे देखते हुए धर्मगुरुओं का दायित्व और अधिक बढ़ गया है |
साम्प्रदायिक सौहार्द, सदभाव और समन्वय की प्यास और अधिक
गहरी हो गई है |
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धर्म के नाम पर घृणा, साम्प्रदायिकता और विद्वेष का जो वातावरण फैला है,
उसके मूल में धर्मनेता और राजनेता के स्वार्थ और अहंकार जुड़े हुए हैं |
अपने स्वार्थ एवं अहं की पूर्ति के लिए वे भोली-भाली धर्मांध जनता को आगे कर देते हैं |
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साम्प्रदायिक उन्माद से भरे घोष एवं नारों का ऐसा मायाजाल रचते हैं कि
सामान्य जनता उसमें फंस जाती है |
दो-चार व्यक्तियों का संघर्ष साम्प्रदायिकता की चिंगारी सुलगा देता है |
दो-चार स्वार्थी व्यक्ति उसमें इंधन डाल देते हैं |
धर्मांध जनता उसे चिरजीवी बना देती है |
- "महाप्रज्ञ : जीवन-दर्शन..पृष्ठ संख्या - १११" से
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साम्प्रदायिकता का ज़हर !!! - ४
आग
पहले ही सुलग गई थी
अब
वह फ़ैल चुकी है
दिग-दिगंत के हर विवर में
हर कोने में
उसे
सुलगाया
सोने वालों ने
उसे
सहलाया
अपनी आँखों को
हलका करने के लिए
रोने वालों ने |
- "महाप्रज्ञ : जीवन-दर्शन..पृष्ठ संख्या - १११" से
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साम्प्रदायिकता का ज़हर !!!- ५
साम्प्रदायिक कट्टरता का मूल बीज है - घृणा |
उसका अंकुर है - -
धर्म खतरे में है - का नारा |
चिंतन की गहराई में जाने पर अनुभव होता है कि
साम्प्रदायिकता कोई मूल समस्या नहीं है |
हम मूल समस्या को नहीं देख रहे हैं |
यदि साम्प्रदायिकता समस्या होती तो
उसे विचार के स्तर पर सुलझाया जा सकता था |
किन्तु जब विचारों की भिन्नता सिरदर्द नहीं है
तो विचार के स्तर पर उसकी पीड़ा को कैसे समाप्त किया जा सकेगा ?
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साम्प्रदायिक वे हैं,
जो दूसरों को तोड़ने की नीति पर चलते हैं |
दूसरों को तोड़ने की नीति का नाम है - -
साम्प्रदायिकता |
- "महाप्रज्ञ : जीवन-दर्शन..पृष्ठ संख्या - १११" से
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साम्प्रदायिकता का ज़हर !!!- ६
इसका समाधान हम खोजना चाहते हैं तो
गंभीर चिंतन होना आवश्यक है |
आवश्यक तो यह भी है कि
धर्म, राजनीति और जाति का एकीकरण न हो,
पर यह वैचारिक स्वतंत्रता का प्रश्न है,
इसलिए यह कहना मेरे लिए कठिन है कि
ऐसा कोई न माने |
ऐसा मान लेने पर प्रलोभन और बल की नींव को
कमज़ोर में सफल होते हैं तो
हमारी समस्या का खम्भा हिल जाता है |
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साम्प्रदायिक दंगे कट्टरपंथी लोग भड़काते हैं |
यह आज के शिष्ट समाज के लिए सचमुच लज्जा की बात है |
क्या ऐसा नहीं हो सकता कि
सांप्रदायिक समस्याओं के समाधान के लिए भी कोई
शक्तिशाली मंच बने और
वहां बैठकर सभी एक साथ बैठकर साम्प्रदायिकता से
उपजने वाली समस्याओं पर विचार करें और
उनका समाधान खोजें |
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यदि ऐसा होता है तो
शताब्दियों से बोए गए घृणा के बीज विद्वेषमूलक
भावना को समाप्त कर मानव समाज को विचार के स्तर
पर स्वतंत्र और भिन्न मानते हुए भी भावना के स्तर पर
उसकी एकात्मकता को देखा जा सकता है |
- "महाप्रज्ञ : जीवन-दर्शन..पृष्ठ संख्या - १११" से
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