Tuesday, February 16, 2016

भाषा से पहचान

भाषा से पहचान 
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एक अंधा व्यक्ति सड़क पर जा रहा था |
रास्ते में कोई बोला - अंधे बाबा ! राम-राम |
अंधा बोला - जाट भाई राम-राम |
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फिर कोई बोला - सूरदास जी राम-राम |
अंधा बोला - ठाकुर सा ! राम-राम |
-आचार्यश्री  महाप्रज्ञजी
( भाषा का विवेक - अंधा भी समझ लेता है " कौन बोल रहा है ")

Tuesday, January 12, 2016

ईर्ष्या से क्या हो सकता है ?

एक व्यक्ति के मन में दुसरे के प्रति ईर्ष्या का भाव है |
उसके प्रति जलन है 
तो उसे पेप्टिक अल्सर होने की सम्भावना होती है |
आदमी सोचेगा कि 
मैंने अपना खानपान ठीक रखा,
खाने में कोई गडबडी नहीं हुई,
तो फिर यह
पेप्टिक अल्सर मुझे कैसे हो गया ?
पेट में फोड़ा क्यों हुआ ?
बीमारी का सबसे बड़ा कारण है -
हमारा नकारात्मक भाव ( Negative Thinking )
ईर्ष्या, लोभ, मोह -
ये सब नकारात्मक भाव हैं |
इन्हें हिंसा की कोटि में भी रखा जा सकता है |
ये हमारे शरीर को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं |

- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी 

Monday, January 11, 2016

धर्म नाम या रूप में नहीं होता

धर्म नाम या रूप में नहीं होता - १ 
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अगर कोई महावीर की आत्मा को छूने का प्रयत्न करे,
कोई 
राम
और 
कृष्ण की आत्मा का स्पर्श करे,
बुद्ध की आत्मा को छूने का प्रयत्न करे,
कोई
ईसा
और
मुहम्मद साहब
की आत्मा का स्पर्श करे,
गुरु नानक की आत्मा का स्पर्श करे
या
जितने भी महापुरुष हुए हैं,
वहां कोई विवाद नहीं है,
कोई झगड़ा नहीं है |
सारा विवाद और संघुर्ष वेशभूषा में अटक गया |
नाम और रूप में अटक गया |
नाम-रूप से ऊपर उठे बिना समस्या का समाधान नहीं होता |

- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी
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धर्म नाम या रूप में नहीं होता - २ 
एक संत किसी घर आये |
मकान मालिक ने स्वागत किया |
अनुरोध किया - " दूध लेने की कृपा करें |"
संत के हां भरने पर गृहस्वामी ने नौकर को दूध लाने का आदेश दिया |
नौकर गया
और
तुरंत लौटा और बोला -
" मालिक ! कौन सी गाय का दूध लाऊं,
काली गाय
या
सफ़ेद गाय का ?
दूध गौण बन गया,
काली और सफ़ेद गाय मुख्य हो गयी |
मालिक बोला -
" किसी की भी ला ! किन्तु जल्दी ला |"
आखिर मन तो चंचल ही है |
नौकर फिर लौटा और बोला -
" मालिक ! नई व्याई हुई गाय का लाऊँ
या
पुरानी गाय का लाऊं ?

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आदमी उलझा है -
नाम-रूप में,
नई-पुरानी में,
सफ़ेद और काली में |
मन में इतने विकल्प हैं कि
उनका कोई अंत नहीं है |

- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी 

Sunday, January 10, 2016

भार कहाँ गया ?

भार कहाँ गया ?
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दिल्ली में समाज के अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने वार्तालाप के मध्य गुरुदेव से पूछा -
गुरुदेव ! आप अपना दायित्व(महाप्रज्ञजी को युवाचार्य पद सौंपने से) सौंपने के बाद कैसा अनुभव करते हैं ?
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पूज्य गुरुदेवश्री तुलसी ने फरमाया -
मैं बहुत ही आनंद का अनुभव कर रहा हूँ |
एक योग्य और सक्षम व्यक्ति को उत्तराधिकार सौंपकर
मैं निश्चिन्त हो गया हूँ |
मुझे कुछ भी चिंता नहीं है |
मैं एकदम हल्का-फुल्का-सा हो गया हूँ |
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वे महानुभाव कुछ क्षण पश्चात् युवाचार्यश्री महाप्रज्ञजी के पास पहुंचे |
युवाचार्यश्री से भी उन्होंने यही प्रश्न पूछा -
एक महान और गरिमापूर्ण दायित्व को ओढ़ने के बाद कैसा लगता हैं ?
क्या आप भार महसूस नहीं करते ?
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युवाचार्यश्री महाप्रज्ञजी -
यह सच है कि
मुझे एक महान आचार्य का उत्तराधिकार मिला है,
लेकिन मैं भारी नहीं हूँ |
मैं आज भी उतना ही हल्का हूँ
जितना युवाचार्य बनने से पूर्व था |
गुरुदेव आज भी उसी निष्ठा से धर्मसंघ के विकास के लिए
कार्यशील हैं,
चिंतित हैं,
सचेष्ट हैं,
इसलिए मैं सर्वथा निश्चिन्त भी हूँ |
यह नया दायित्व न मेरी चिंता बढ़ा पाया है,
न भार बढ़ा पाया है |
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युवाचार्यश्री महाप्रज्ञजी के इस उत्तर को सुनकर सब विस्मित रह गए |
उनके गले नहीं उतर रहा था यह उत्तर |
उन्होंने फिर पूछा -
युवाचार्यश्री !
गुरुदेव कहते हैं - मैं भारी नहीं हूँ |
आप कहते हैं - मैं भी भारी नहीं हूँ |
आखिर वह भार गया कहाँ ?
न वह गुरुदेव के पास है,
न आपके पास है तो वह भार है किसके पास ?
यह बात हमारी समझ के बाहर है |
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महाप्रज्ञजी यह सुनकर मुस्करा उठे |
आपकी इस स्मित मुस्कान में उस प्रश्न का उत्तर छिपा था |