Friday, April 30, 2021

सुशीलजी को उत्तर


My reply on a post - Sushil Kumar Bafana जी ! मेरे पास समय भी है और साहित्य भी उपलब्ध है |
पर मेरी भावना है कि सदस्यों की तरफ से जिज्ञासा आये |
आपको तो मैं क्या बताऊँ, 
आपसे तो वर्षों तक भी सीखूं तो कम है |
धन्यवाद |
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Sushil Kumar Bafnajii -
 chanchalji aap abhi great kam kar rahe hain aur apki image as internation level ki hain. mera sobhagya hain aap mujhe itna valsly pradan karva rahe hain.---------lekin plz bat level tak hi rakhe---आपसे तो वर्षों तक भी सीखूं तो कम है |-----yah thik nahi hain aur vese bhi ham dono rajnedraji bengani ka saman rup se bahut sammna dete hain unse bahut kuchh sikha ja sakata hain.
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My reply -
 Sushil Kumar Bafana जी ! मेरा आपसे मिलने का काम तो नहीं पड़ा है, पर पिछली भिक्षु तेरस को ही राजेंद्रजी बेंगानी ( भाईसा ) से आपके बारे में विस्तार से बातें हुई |
क्या बातें हुई, वो तो मैं यहां लिखना उपयुक्त नहीं समझता हूं |
पर मैंने जो ऊपर लिखा है, वह अतिशयोक्ति नहीं है |
मैं युन्हीं प्रशंसा भी नहीं करता हूं |
पर हां ! प्रमोद भावना अलग है |
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My additional reply -
 Sushil Kumar Bafanaजी ! मुझे सात्विक गर्व है कि
श्री राजेंद्रजी बेंगानी ( भाईसा ) मुझे दुबई की धरती पर मिले |
मैंने उन्हीं से अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया है और अभी भी वही मुझे सिखा रहे हैं |
धन्यवाद |
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Prabha's also commented 
 Sushilji bhaisa aap ke baare me jyada kuchh nahi janti par Rajnedraji bhaisa ne aapke bare me kafi kuchh kaha, tabhi se aap ke prati kafi sraddha ke bhav jage mere man me !

भगवान महावीर का वैराग्य

 साधना के लिए एकांतवास और मौन

- ये आवश्यक हैं |
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जो पहले अपने को न साधे,
वह दूसरों का हित नहीं साध सकता |
स्वयं अपूर्ण पूर्णता का मार्ग नहीं दिखा सकता |
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कई आदमी भगवान् का अभिवादन करते,
फिर भी वे उनसे नहीं बोलते |
कई आदमी भगवान् को मारते-पीटते;
किन्तु उन्हें भी वे कुछ नहीं कहते |
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भगवान् वैसी कठोरचर्या में रम रहे थे,
जो सबके लिए सुलभ नहीं है |
- आचार्य श्री महाप्रज्ञजी के
" जैन धर्म : मनन और मीमांसा पृष्ठ संख्या - २० " से
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सहज आनंद और आत्मिक चैतन्य जागृत नहीं होता,
तब तक बाहरी उपकरणों के द्वारा आमोद पाने की चेष्टा होती है |
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जिनके चैतन्य का पर्दा खुल जाता है,
सहज सुख का स्रोत फूट पड़ता है
- वे नीरस होते ही नहीं,
वे सदा समरस रहते हैं |
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बाहरी साधनों के द्वारा अंतर के नीरस भाव को
सरस बनाने का यत्न करने वाले
भले ही उसका मूल्य न आंक सकें |
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भगवान स्त्री-कथा, भक्त-कथा,
देश-कथा और राज-कथा में भाग नहीं लेते |
उन्हें मध्यस्थ भाव से टाल देते |
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भगवान ने विजातीय तत्त्वों (पुदगल-आसक्ति) को
न शरण दी और न उनकी शरण ली |
वे निरपेक्ष भाव से जीते रहे |
- आचार्य श्री महाप्रज्ञजी के
" जैन धर्म : मनन और मीमांसा पृष्ठ संख्या - २० " से
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अपेक्षा का अर्थ है - दुर्बलता |
व्यक्ति का सबल और दुर्बल होने का
मापदण्ड (criteria)अपेक्षाओं की न्यूनाधिकता है |
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भगवान् श्रमण बनने से दो वर्ष
पहले ही अपेक्षाओं को ठुकराने लगे |
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सजीव पानी पीना छोड़ दिया;
अपना अकेलापन देखने लग गए |
क्रोध, मान, माया और लोभ की ज्वाला को शांत कर डाला |
सम्यग् दर्शन का रूप निखर उठा |
पौदगलिक आस्थाएं हिल गईं |
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भगवान् ने मिट्टी, पानी, अग्नि, वायु, वनस्पति और
चर जीवों का अस्तित्व जाना |
उन्हें सजीव मान वे उनकी हिंसा से विलग हो गए |
- आचार्य श्री महाप्रज्ञजी के
" जैन धर्म : मनन और मीमांसा पृष्ठ संख्या - २० " से
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भगवान् का दृष्टि-संयम अनुत्तर था |
वे चलते समय इधर-उधर नहीं देखते,
पीछे नहीं देखते,
बुलाने पर भी नहीं बोलते,
सिर्फ मार्ग को देखते हुए चलते |
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Tuesday, February 16, 2016

भाषा से पहचान

भाषा से पहचान 
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एक अंधा व्यक्ति सड़क पर जा रहा था |
रास्ते में कोई बोला - अंधे बाबा ! राम-राम |
अंधा बोला - जाट भाई राम-राम |
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फिर कोई बोला - सूरदास जी राम-राम |
अंधा बोला - ठाकुर सा ! राम-राम |
-आचार्यश्री  महाप्रज्ञजी
( भाषा का विवेक - अंधा भी समझ लेता है " कौन बोल रहा है ")

Tuesday, January 12, 2016

ईर्ष्या से क्या हो सकता है ?

एक व्यक्ति के मन में दुसरे के प्रति ईर्ष्या का भाव है |
उसके प्रति जलन है 
तो उसे पेप्टिक अल्सर होने की सम्भावना होती है |
आदमी सोचेगा कि 
मैंने अपना खानपान ठीक रखा,
खाने में कोई गडबडी नहीं हुई,
तो फिर यह
पेप्टिक अल्सर मुझे कैसे हो गया ?
पेट में फोड़ा क्यों हुआ ?
बीमारी का सबसे बड़ा कारण है -
हमारा नकारात्मक भाव ( Negative Thinking )
ईर्ष्या, लोभ, मोह -
ये सब नकारात्मक भाव हैं |
इन्हें हिंसा की कोटि में भी रखा जा सकता है |
ये हमारे शरीर को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं |

- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी 

Monday, January 11, 2016

धर्म नाम या रूप में नहीं होता

धर्म नाम या रूप में नहीं होता - १ 
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अगर कोई महावीर की आत्मा को छूने का प्रयत्न करे,
कोई 
राम
और 
कृष्ण की आत्मा का स्पर्श करे,
बुद्ध की आत्मा को छूने का प्रयत्न करे,
कोई
ईसा
और
मुहम्मद साहब
की आत्मा का स्पर्श करे,
गुरु नानक की आत्मा का स्पर्श करे
या
जितने भी महापुरुष हुए हैं,
वहां कोई विवाद नहीं है,
कोई झगड़ा नहीं है |
सारा विवाद और संघुर्ष वेशभूषा में अटक गया |
नाम और रूप में अटक गया |
नाम-रूप से ऊपर उठे बिना समस्या का समाधान नहीं होता |

- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी
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धर्म नाम या रूप में नहीं होता - २ 
एक संत किसी घर आये |
मकान मालिक ने स्वागत किया |
अनुरोध किया - " दूध लेने की कृपा करें |"
संत के हां भरने पर गृहस्वामी ने नौकर को दूध लाने का आदेश दिया |
नौकर गया
और
तुरंत लौटा और बोला -
" मालिक ! कौन सी गाय का दूध लाऊं,
काली गाय
या
सफ़ेद गाय का ?
दूध गौण बन गया,
काली और सफ़ेद गाय मुख्य हो गयी |
मालिक बोला -
" किसी की भी ला ! किन्तु जल्दी ला |"
आखिर मन तो चंचल ही है |
नौकर फिर लौटा और बोला -
" मालिक ! नई व्याई हुई गाय का लाऊँ
या
पुरानी गाय का लाऊं ?

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आदमी उलझा है -
नाम-रूप में,
नई-पुरानी में,
सफ़ेद और काली में |
मन में इतने विकल्प हैं कि
उनका कोई अंत नहीं है |

- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी 

Sunday, January 10, 2016

भार कहाँ गया ?

भार कहाँ गया ?
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दिल्ली में समाज के अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने वार्तालाप के मध्य गुरुदेव से पूछा -
गुरुदेव ! आप अपना दायित्व(महाप्रज्ञजी को युवाचार्य पद सौंपने से) सौंपने के बाद कैसा अनुभव करते हैं ?
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पूज्य गुरुदेवश्री तुलसी ने फरमाया -
मैं बहुत ही आनंद का अनुभव कर रहा हूँ |
एक योग्य और सक्षम व्यक्ति को उत्तराधिकार सौंपकर
मैं निश्चिन्त हो गया हूँ |
मुझे कुछ भी चिंता नहीं है |
मैं एकदम हल्का-फुल्का-सा हो गया हूँ |
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वे महानुभाव कुछ क्षण पश्चात् युवाचार्यश्री महाप्रज्ञजी के पास पहुंचे |
युवाचार्यश्री से भी उन्होंने यही प्रश्न पूछा -
एक महान और गरिमापूर्ण दायित्व को ओढ़ने के बाद कैसा लगता हैं ?
क्या आप भार महसूस नहीं करते ?
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युवाचार्यश्री महाप्रज्ञजी -
यह सच है कि
मुझे एक महान आचार्य का उत्तराधिकार मिला है,
लेकिन मैं भारी नहीं हूँ |
मैं आज भी उतना ही हल्का हूँ
जितना युवाचार्य बनने से पूर्व था |
गुरुदेव आज भी उसी निष्ठा से धर्मसंघ के विकास के लिए
कार्यशील हैं,
चिंतित हैं,
सचेष्ट हैं,
इसलिए मैं सर्वथा निश्चिन्त भी हूँ |
यह नया दायित्व न मेरी चिंता बढ़ा पाया है,
न भार बढ़ा पाया है |
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युवाचार्यश्री महाप्रज्ञजी के इस उत्तर को सुनकर सब विस्मित रह गए |
उनके गले नहीं उतर रहा था यह उत्तर |
उन्होंने फिर पूछा -
युवाचार्यश्री !
गुरुदेव कहते हैं - मैं भारी नहीं हूँ |
आप कहते हैं - मैं भी भारी नहीं हूँ |
आखिर वह भार गया कहाँ ?
न वह गुरुदेव के पास है,
न आपके पास है तो वह भार है किसके पास ?
यह बात हमारी समझ के बाहर है |
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महाप्रज्ञजी यह सुनकर मुस्करा उठे |
आपकी इस स्मित मुस्कान में उस प्रश्न का उत्तर छिपा था |

Wednesday, December 30, 2015

स्वाध्याय/बातें

स्वाध्याय/बातें
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आचार्यवर (संतों से) - स्वाध्याय जीवन का सार-तत्त्व है |
जो जितना स्वाध्याय करेगा,
उसका जीवन विकासोन्मुखी बनेगा |
इसलिए स्वाध्याय में मन लगाना चाहिए |
प्रोफ़ेसर मुनिश्री महेंद्रकुमारजी -
भंते ! बातों की अपेक्षा स्वाध्याय में मन कम लगता है,
इसका क्या कारण है ?
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आचार्यवर - जीवन रूचि के आधार पर चलता है |
रूचि और वातावरण आकर्षण पैदा करता है |
जिसको अपने हित और अहित का ज्ञान होता है,
उनका मन स्वाध्याय में अधिक लगेगा और
जिसमें इस ज्ञान का अभाव है,
उन्हें केवल वार्तालाप का वातावरण मिलने से बाह्य आकर्षण लुभाता है,
बातें अच्छी लगती हैं |