Sunday, July 14, 2013

आकाश तत्व

आकाश तत्व
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आकाश तत्व का स्थान है - विशुद्धि केंद्र ( विशुद्धिचक्र ) |
शरीर के पोले भाग में यह तत्व विद्दमान है |
मध्यमा अंगुली को अंगूठे से दबाने पर शरीर में
आकाश तत्व सक्रिय होता है |
इसकी सक्रियता से आध्यात्मिक जागरण होता है,
शरीर कांतिमय बनता है और
स्वभाव में उदारता आती है |
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फुफ्फुस, यकृत और पित्ताशय पर इसका नियंत्रण है |
इसके आधिक्य से निराशा, चिड़चिड़ापन, गुस्सा और
मानसिक बीमारियां होती हैं |
इस तत्व का प्रभुत्व होने से मानसिक शक्तियों
का जागरण होता है |

वायु तत्व


वायु तत्व
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वायु तत्व का स्थान है - आनंदकेंद्र ( अनाहत चक्र ) |
यह समूचे शरीर में व्याप्त है |
तर्जनी अंगुली को अंगूठे के मूल में दबाने पर शरीर
में वायु तत्व सक्रिय होता है |
इसकी सक्रियता से स्फूर्ति रहती है,
प्राणशक्ति प्रबल बनती है,
शारीरिक शक्ति मज़बूत होती है |
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घ्राण शक्ति पर इस तत्व का नियंत्रण है |
इसकी अधिकता से गले व छाती का दर्द,
बुखार, कब्ज़, हिचकी, लकवा और गठिया
आदि रोग उत्पन्न होते हैं |
इसके प्राधान्य से नकारात्मक विचार व
मानसिक तनाव पैदा होता है |
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२१ सितम्बर से २३ दिसंबर तक शरीर में वायुतत्व की प्रधानता रहती है |
- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी


Saturday, July 13, 2013

अग्नि तत्व


अग्नि तत्व
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अग्नि तत्व का स्थान है तैजसकेंद्र ( मणिपुर चक्र ) |
रक्तवाहिनियों में आग्नेय परमाणु विद्दमान रहते हैं |
अग्नि तत्व का स्थान है अंगूठा |
तर्जनी अंगुली को अंगूठे से दबाने पर शरीर
में अग्नि तत्व सक्रिय होता है |
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ह्रदय और आंतों पर इस तत्व का नियंत्रण है |
इसकी अधिकता से कब्ज़, शरीर पर धब्बे आदि शारीरिक बीमारियां होती हैं |
इसकी कमी से छोटी आंत प्रभावित होती है |
यह तत्व भूख, प्यास, नींद और आलस्य को
दूर कर देदीप्यता प्रदान करता है |
इस तत्व की प्रधानता के समय कोई
निर्णय नहीं लेना चाहिए |
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२१ जून से २० सितम्बर तक शरीर में अग्नि तत्व की प्रधानता रहती है |
- आचार्य श्री महाप्रज्ञजी

Thursday, July 11, 2013

जल तत्व









जल तत्व
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जल तत्व का स्थान है -
स्वास्थ्य केंद्र ( स्वाधिष्ठान चक्र )
कान, सिर के बाल और हड्डियों में जलीय परमाणुओं की विद्दमानता है |
अनामिका अंगुली को अंगूठे से दबाने पर शरीर में जलतत्व का संतुलन होता है |
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आंसू, कफ़, थूक, रक्त, प्रस्वेद, श्लेष्म आदि
पर इस तत्व का नियंत्रण है |
इसकी अधिकता से गैस, ह्रदय पर असर,
मुख फीका, हकलाना, चमड़ी में कम्पन आदि रोग होते हैं |
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इस तत्व पर नियंत्रण होने से भूख-प्यास शांत होती है और
मैत्री का विपाक होता है |
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२१ मार्च से २० जून तक शरीर में जल तत्व की प्रधानता रहती है |

प्रसन्न कैसे रहे ?


जब हम आचार्य भिक्षु के जीवन पर दृष्टिपात करते हैं
तो पाते हैं कि अप्रिय घटनाएं उनके जीवन में बहुत आईं,
पर कभी उनका संतुलन नहीं बिगड़ा |
वे सदा प्रसन्न रहे |
जिनकी मति शुद्ध होती है,
वह प्रसन्न रह सकता है |
जिसकी मति शुद्ध और प्रतिबुद्ध नहीं होती,
वह प्रसन्न नहीं रह सकता |

कष्ट बर्दाश्त नहीं होता

कष्ट बर्दाश्त नहीं होता -
राजा श्रेणिक का पुत्र मेघ कुमार जिस दिन दीक्षित हुआ, 
तो दीक्षा के क्रम से उसे दरवाजे के पास सोने की जगह दी गयी |
रात भर साधुओं के आवागमन से वो नींद न ले सका |
सवेरे ही सवेरे मेघ प्रभु महावीर के पास गया 
और
निवेदन किया कि
मुझसे साधुपन का कष्ट बर्दाश्त नहीं होता,
मैं वापस महल जा रहा हूँ |
प्रभु ने समझकर कहा - मेघ ! एक रात्री के कष्ट से तुम इतने विचलित हो गए,
पिछले जन्म में तू हाथी था
और
एक खरगोश पर करुणा की,
इसलिए अपना पैर भी नीचे नहीं किया
और
उसी हालत में मृत्यु को प्राप्त हुए |
मेघ को जाति स्मरण ज्ञान हुआ और प्रभु के चरणों में वंदन करके क्षमा मांगी |

दिन और रात का अंतर

छज्जे पर कबूतर बैठे थे |
सूर्यास्त हो चूका था |
अँधेरे ने अपने पांव फैला दिये |
आचार्य श्री महाप्रज्ञजी का कवि-मानस बोल उठा -
" पहले क्षण में अनंत आकाश में उड़नेवाले ये कबूतर 
दुसरे क्षण में घरों के छज्जों पर आ बैठते हैं |
दिन और रात में कितना अंतर होता है -
इसे कबूतर ही जान सकते हैं,
दुसरे नहीं |

उदय/ अस्त

आचार्य श्री महाप्रज्ञजी परिवर्तन के क्रम को अनिवार्य मानते हैं |
इस क्रम में आश्चर्य के लिए कोई अवकाश नहीं है |
उदय-अस्त - इस विषय पर उनकी कविता का अनुवाद -
" सूर्य के अस्त होने पर चंद्रमा उदित होता है 
और 
चन्द्रमा के अस्त होने पर सूर्य उदित होता है |
इसमें आश्चर्य क्या है ?
क्योंकि संसार की यही रीति है कि
कोई उदित होता है और कोई अस्त |

पहली कविता

देखा कोकिल के गलहार, प्रस्फुट होता था आभार |
जी खोल कौए ने पूछा - बहिन ! कहाँ पाया उपहार ?
महाप्रज्ञजी की पहली कविता 
वि. स.२००० में रचित

आप अमृत बांट रहे हैं

‎"आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी फरमाते थे -
गुरु उलाहना देते और साध्वियां फरमाती -
" आप अमृत बांट रहे हैं "
~ आचार्य श्री महाश्रमण जी

सभी भरे हुए को ही भरते हैं

मेघाष्टकम - 
आचार्य श्री महाप्रज्ञजी ने मेघ को गहराई से देखा |
मेघ के माध्यम से उन्होंने मानवीय प्रकृति को चित्रित करते हुए लिखा -
" जिस मरुधर प्रदेश में सूर्य के आतप से भूमि-विभाग अग्नि की तरह तप उठता है 
और 
जहां के प्यासे लोग चिलचिलाती धुप से झुलसते हुए बूँद-बूँद के लिए प्रतीक्षा करते हैं,
वहां मेघ का दर्शन सुलभ नहीं होता |
किन्तु जहां समुद्र की लहरें उछलती रहती हैं,
वहां बादलों का समूह आकाश में मंडराता रहता है |
( वर्षा भी अत्यधिक होती है )
यह सत्य है कि
सभी लोग भरे हुए को ही भरते हैं |

मुझे कोई न् डांटे

मुझे कोई न् डांटे -
मां ने डांटा और बेटा घर छोड़कर चला गया |
सहनशीलता की इतनी कमी हो गयी है 
तो विकास कैसे होगा ?
योग्यता बढानी है 
तो सहन करना सीखना होगा |
- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी 

साध्वीजी और हाथी


साध्वी मोहनांजी ( राजगढ़ ) आसाम की यात्रा कर रही थी |
वहां घोर जंगल में विशालकाय जंगली हाथी सामने आ गया |
साध्वीजी वहीँ खड़ी हो गईं |
इधर साध्वीजी; उधर हाथी |
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आमने-सामने दोनों !
दोनों मौन !!
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साध्वी मोहनांजी इस विकट स्थिति में
" चैत्य पुरुष जग जाए "
इस मन्त्र समन्वित गीत के पदों को गुनगुनाने लगी |
यह गीत अभय का मन्त्र बन गया |
गीत की लहरियों ने पुरे वातावरण में अभय का संचार कर दिया |
सस्वर गीत के शक्तिशाली प्रकम्पनों ने विशालकाय हाथी के
अवचेतन मन को प्रभावित किया |
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साध्वीजी मंत्रपुरित गीत के गायन में तन्मय बनी रहीं |
न वह हाथी एक कदम आगे बढ़ा,
न साध्वीजी ने एक कदम पीछे रखा |
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कुछ क्षण बीते !!!
हाथी कुछ पीछे हटा,
दूसरी दिशा में मुड़ गया |


अब दर्शन नहीं...


अब दर्शन नहीं ....
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मैं उस सौभाग्यशाली परिवार का सदस्य हूं
जहां गणाधिपति तुलसी ने अंतिम एकांतवास किया,
हमारे परिवार को सेवा का अवसर दिया |
पीढ़ियों से ही पुरे परिवार में ' गुरु-दर्शन-सेवा '
के संस्कार गहरे जमे हुए हैं |
चार पीढ़ियों से अनवरत यह क्रम चल रहा है |
सामूहिक रूप से भी और जब, जैसे, जिसको
अवसर मिल जाए,
दर्शन-सेवा का सौभाग्य हर सदस्य हासिल कर ही लेता है |
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उसी क्रम से दिल्ली से बीकानेर की ओर जाते हुए
भादासर में २२ अप्रैल २०१० को पूज्य गुरुदेव
( आचार्य महाप्रज्ञजी ) की उपासना में पहुंचा |
सेवा, उपासना का अच्छा लाभ मिला |
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जाते समय मंगल पाठ सुनने से पूर्व मैंने
निवेदन किया -
" वापस जल्दी दर्शन करूंगा |"
पता नहीं क्यों ?
गुरुदेव ने तत्काल फ़रमाया -
" अब दर्शन नहीं....|"
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मेरे मन में आया --
गुरुदेव ने ऐसा क्यों फरमाया ?
मैं हार्ट का पेशेंट हूं |
कहीं मेरी भावी की ओर इंगित करते हुए ही तो
पूज्यवर ने ऐसा नहीं फरमाया है |
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कभी भी, कुछ भी हो जाए
तो सावधान हो जाना चाहिए |
फलतः बीकानेर घर जाकर पत्नी को बता दिया -
गुरुदेव ने ऐसा फरमाया है -
मेरे कभी कुछ हो जाए,
कोई घटना घटित हो जाए
तो बच्चों का ध्यान रखना |
सबको पूरी तरह सम्भालवन दे दी |
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पर उन शब्दों का अर्थ ९ मई २०१० अचानक दूसरा ही दे गई |
अब मन में आता है
काश ! गुरुदेव से ही उस कथन का कारण पूछ पाता,
रहस्य को ग्रहण कर पाता |
पर अब तो ये बात बात ही रह गई |
श्रद्धासिक्त भावों से प्रणाम ही कर सकता हूं |
- सुरेन्द्र बोथरा, बीकानेर

अपने आप को बुढा न माने

कोई अपने आप को बूढा न माने |
लोग कहते थे कि साठ वर्ष का हो गया,
अब बुद्धि सठिया गयी |
ऐसी बातों पर ध्यान मत दो |
यह सर्वथा गलत धारणा है |
साठ-सत्तर वर्ष के बाद तो बुद्धि का विकास होना शुरू होता है |
कोई व्यक्ति निरंतर पढ़ेगा,
चिंतन करेगा,
मष्तिष्क से ज्यादा काम लेगा,
वह बूढा नहीं बनेगा |
जो मष्तिष्क से काम नहीं लेगा,
वह चालीस-पचास की उम्र में सठिया जाएगा |
मष्तिष्क की असीम शक्तियों को पहचानें |
दार्शनिक दृष्टि से हम कहता हैं -
आत्मा में अनंत शक्ति है |
वर्तमान जीवन की दृष्टि से हम कह सकते हैं -
मष्तिष्क में अनंत शक्ति है,
अगर उसका उपयोग करें तो................

- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी 

तितिक्षा

सर्दी और गर्मी,
भूख और प्यास
ये सारे द्वंद्व हैं |
द्वंदों को सहन करने का नाम है ' तितिक्षा '|
सारे वातावरण में द्वंद्व भरे हुए हैं |
जब तक उनको सहन करने की क्षमता नहीं बढती,
तब तक व्यक्ति सुख का जीवन नहीं जी सकता |

असाधु/साधू


भगवान् महावीर को 'संगम' देवता ने ६ महीने तक यंत्रणाएं,
ताड़णाएं और मारणान्तिक कष्ट दिए |
महावीर प्रभु मौन-शांत सब सहते गए |
अंत में देवता थक गया |
जब जाने लगा,
तब अपने असद् व्यवहार की क्षमा मांगी |
महावीर प्रभु ने कहा -
" तुमने अपना काम किया और मैंने अपना काम किया |
असाधु असाधु के सिवाय और क्या कर सकता है ? तथा
साधू साधूता के सिवाय और क्या कर सकता है ?
मुझे दुःख है कि मेरा जीवन विश्व-कल्याण के लिए है और
तुम मेरे ही कारण अपना पतन कर रहे हो |"

बढ़ता कौन है ?

एक व्यक्ति जापान गया |

वहां उपवन में घूम रहा था |

देखा, देवदार के वृक्ष ३००-४०० फीट ऊंचे हैं |

आकाश को छू रहे हैं |

आगे चला |

देखकर हैरान रह गया कि कुछ देवदार के वृक्ष अत्यंत बौने हैं |

उनकी ऊंचाई ३-४ फीट ही है |

उसने माली से पूछा |

माली ने बताया - " जिनकी जडें काट दी जाती है, वे ३-४ फीट के रह जातें हैं |

जिनकी जडें काटी नहीं जाती, वे ३००-४०० फीट के हो जाते हैं |

श्रद्धा जड़ है, वह जिनकी कट जाती है, वोह व्यक्तित्व बौना रह जाता है |

जिनकी श्रद्धा मज़बूत रहती है वोह व्यक्तित्व लहलहाने लगते हैं |

बढ़ता वही है, जिनकी जडें ज़मीन में गहरी चली गयी है |

विनय > विवेक >विदया

विनय > विवेक >विदया
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लाडनूं, १९८९
साध्वी इन्द्रूजी का संथारा चल रहा था |
आचार्य श्री तुलसी महाप्रज्ञ जी के साथ उन्हें दर्शन देने गए |
वहां अनेक साधू-साध्वियां भी उपस्थित थे |
महाप्रज्ञ जी ने साध्वी इन्द्रूजी से कहा -
देखो, इतने साधू-साध्वियां यहाँ उपस्थित हैं |
इन्हें कुछ कहना हो तो बोलो |
साध्वीजी ने ३ शब्दों का उच्चारण किया -
१. विनय,
२. विवेक और
३. विद्या |
युवाचार्य जी महाप्रज्ञजी ने इस वाक्य का रहस्य प्रकट करते हुए कहा -
" साध्वी इन्द्रूजी ने विद्या को तीसरा स्थान दिया है |
इसका तात्पर्य यह है कि
सबसे पहले विनय होना चाहिए |
विनय से विवेक आता है |
विनय और विवेक से शून्य विद्या का कोई मूल्य नहीं होता |"

स्वर्ग को जलाने और नरक को डुबोने जा रही हूं


स्वर्ग को जलाने
और
नरक को डुबोने जा रही हूं |
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'राबिया' एक सूफी साधिका थी |
वह एक हाथ में मशाल और एक हाथ में
पानी की बाल्टी लेकर भागी जा रही थी |
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लोगों ने पूछा -
" आज क्या मामला है ?"
'राबिया' ने कहा -
" स्वर्ग को जलाने और नरक को डुबोने जा रही हूं |"
लोगों ने पूछा - " किसलिए ?"
कहा -
" तुम्हारे धर्म के मध्य में ये दो महान व्यवधान हैं |
१. नरक का भय
२. स्वर्ग का प्रलोभन,
व्यक्ति इन दोनों से मुक्त हो कर ही शुद्ध, सत्य धर्म का स्पर्श कर सकता है |
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कामना से मुक्त होने के बाद जो प्रवृत्ति होती हैं,
वह वास्तविक प्रवृत्ति होती है |
उसमें कोई आकांक्षा-प्रत्याशा नहीं रहती |
फलाकांक्षा और प्रत्याशा से मुक्त होने का पाठ |
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प्रलोभन देकर आदमी से कुछ भी कराया जा सकता है |
धर्म के नाम पर या धर्म होगा --
बस इतना सुनना चाहिए,
मनुष्य का मन द्रवित हो जाता है |
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व्यक्ति अपनी बुद्धि को भ्रमित न करे |
यह भी न भूले कि जीवन का ध्येय है --
समस्त आशंसा से मुक्त होना |


अनर्थ-दण्ड


बिना प्रयोजन चलते-फिरते किसी को मार डालना,
गाली देना, झगड़ा करना, ईर्ष्या करना, द्वेष करना,
वनस्पति को कुचलते हुए चलना, बत्ती को जलाकर छोड़ देना,
घी-तेल के बर्तनों को खुला छोड़ देना इत्यादि ऐसे अनेक काम हैं
जिनसे बचना या परहेज करना अहिंसा की दृष्टि से तो प्रशंसनीय है ही,
किन्तु व्यवहार-दृष्टि से भी अच्छा है |

बैल है, वकील नहीं


बैल है, वकील नहीं !!!
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एक वकील ने तेली को कोल्हू चलाते देखा |
बैल की दोनों आंखों पर पट्टी बंधी थी |
वकील ने पट्टी बांधने का कारण पूछा |
तेली ने कहा -
" इसे पता न चले कि मैं एक ही जगह पर चक्कर काट रहा हूं,
इसलिए और दूसरी बात यह कि
इसे पता न चले कि मैं इसके पीछे नहीं हूं |"
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तभी वकील का ध्यान बैल के गले में बंधी घंटी की ओर गया
तो उसने पूछा " और यह घंटी किसलिए ?"
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तेली ने कहा -
" घंटी न बजने से मुझे पता चल जाता है कि
बैल चल नहीं रहा है, बल्कि खड़ा हो गया है |
उस समय मैं इसकी पीठ पर फिर से धौल जमा देता हूं
और यह चलने लगता है |"
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वकील ने पता नहीं क्या सोचा,
फिर बोला -
" बैल के चलने से घंटी बजती है,
लेकिन बिना चले भी तो घंटी बजाई जा सकती है |
अगर बैल खड़े-खड़े अपना सिर हिलाता रहे
तो भी घंटी बजेगी |
ऐसे में तुम्हें कैसे पता चलेगा कि
बैल खड़ा हो गया है ?"
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तेली वकील के प्रश्न पर प्रश्न और उसके तर्क के चिढ़ गया |
उसने कहा -
" श्रीमान ! यह बैल है, कोई वकील नहीं है |
इतनी चालाकी इसे नहीं आती,
अन्यथा कोल्हू में जुटने की बजाय काला कोट पहनकर
यह भी अदालत में खड़ा होता |"
- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी

कस्तूरी कुंडल बसै मृग ढूंढे वन माहिं !!!


कस्तूरी कुंडल बसै मृग ढूंढे वन माहिं !!!
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हिमालय की तराई वाले क्षेत्रों में कस्तूरी मृग पाया जाता है |
उसकी नाभि में एक ग्रंथि होती है,
जिससे बहुत सुगंध आती है |
यह तेज सुगंध मृग को बेचैन कर देती है और
वह उसकी तलाश में मारा-मारा फिरता है |
है वह अपने पास और वह उसे बाहर ढूँढता है |
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आनंद के सन्दर्भ में यही स्थिति मनुष्य की है |
सुख के सारे साधन मनुष्य ने ही बनाए
और बनाता जा रहा है |
क्या वह सुखी बन पाया ?
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मैंने तो वातानुकूलित कक्ष में डनलप के गद्दे पर
चीखते-चिल्लाते लोगों को देखा है |
कभी-कभी मंगल-पाठ सुनाने के क्रम में
ऐसे दृश्य देखने में आ जाते हैं |
क्या अर्थ रहा जीवन भर भागादौड़ी कर सुख-सुविधा के साधनों को जुटाने का ?
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भीतर का आनंद प्रकट नहीं हुआ तो
पदार्थजनित सारे सुख निरर्थक सिद्ध होंगे |
अगर भीतर आनंद का स्रोत फूट रहा है
तो राजमहल और जंगल दोनों एक-सा सुख देंगे |
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राम चौदह वर्ष के लिए वनवासी होने जा रहे थे |
छोटे भाई भरत उनसे प्रार्थना करते हैं कि
आप राजकाज करें,
वनवास आपकी जगह मैं भोग लूंगा |
लेकिन राम भरत की बात को स्वीकार नहीं करते |
श्री कृष्ण का जीवन भी बहुत आराम का नहीं रहा |
तत्कालीन परिस्थिति में उन्हें बहुत कष्ट उठाने पड़े |
यह तो उनका राजनीतिक कौशल था और
भीतर का आनंद और शक्ति थी
जो उन्हें हर समय हंसता-खिलता बनाए रखती थी |
महावीर का जीवन तो कष्टों की पूरी गाथा है |
लेकिन कष्ट और कठिनाइयां उन्हें कभी विचलित नहीं कर सकी |
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बाहर के सुख पर भरोसा नहीं किया जा सकता |
गरमी के महीने में बिजली चली गई और
ए.सी., कूलर अथवा पंखा बंद हुआ नहीं कि
आप कमरे से बाहर निकल जाते हैं |
भीतर का ज्ञान, भीतर का आनंद और
भीतर की शक्ति प्रकट हो जाए तो
बाहर की सारी निर्भरता समाप्त हो जायेगी |
---------------------
भीतर का ज्ञान, आनंद और शक्ति को प्राप्त करने
के लिए भीतर में जाने का अभ्यास करना होगा |
पहले भीतर में प्रवेश करने का अभ्यास,
फिर वहां अधिक से अधिक देर तक रहने का
अभ्यास --
यह क्रम सध जाने के बाद बाहर की रूचियां
धीरे-धीरे अपने आप कम होने लगेंगी |
एक के बार भीतर जाने का स्वाद चख लिया तो
फिर बाहर का हर स्वाद आपको फीका लगने लगेगा |
फिर आप बार-बार अपने भीतर जाना चाहेंगे |
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इसी की चरमावस्था है समाधि,
जो सिद्ध योगी लोग लगाया करते हैं |
सामान्य गृहस्थ योगी वाली क्लिष्ट योग साधना नहीं कर सकता |
किन्तु अपने शरीर, मन और भावों के बारे में
उसे पूरी जानकारी होनी चाहिए,
जिससे जीवन में आनेवाली विघ्न-बाधाओं
से पार पा सकें |


Let go करना सीखें

Let Go करना सीखें -
सुख मनुष्य जीवन की मंजिल है
जिस सुख की प्राप्ति के बाद कभी दुःख की छाया ही न पड़े,
ऐसा सुख बहुत पुरुषार्थ या तपस्या की अपेक्षा रखता है
उस सुख की कल्पना में मनुष्य निरंतर, हर क्षण दुःख ही भोगता रहे
तो उसे कभी सुख नहीं मिल सकेगा
सम्पूर्ण सुख पाने के लिए टुकड़ों में मिलने वाले सुख को क्यों खोया जाए ?
जो लोग अपने जीवन के प्रति जागरूक होते हैं, वे खण्ड-खण्ड में बिखरे हुए सुख को बटोरते हैं और अच्छा जीवन जीते हैं
महान मनोवैज्ञानिक अल्फ्रेड एडिलटन ने लिखा है -
" सुख का रहस्य है हानि को लाभ में बदलना | "
जीवन यात्रा के हर पड़ाव पर मनुष्य को जो सौगात मिलती है,
उसमें लाभ होता है , हानि भी होती है
ऐसा व्यक्ति कोई भी नहीं होगा जिसे केवल सुख ही मिला हो या केवल दुःख ही मिला हो
धुप और छाया की तरह सुख-दुःख एक-दुसरे से जुड़े हुए हैं
सुख में अतिरिक्त प्रसन्नता
दुःख में खिन्नता - यह सुख की सबसे बड़ी बाधा है
जो व्यक्ति दोनों स्थितियों में सम या संतुलित रहना जानता है,
उससे कोई भी शक्ति सुख छीन नहीं सकती
एक तरीका और भी है
दुःख को सुख में बदलना
इसका छोटा सा मंत्र है
" कोई बात नहीं "
Let Go करना सीखें

मन चंगा तो कठौती में गंगा


मन चंगा तो कठौती में गंगा !!!
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संत रैदास जाति के चर्मकार थे |
गृहस्थ जीवन में भी वे संत का-सा जीवन जीते थे |
पेशा था जुते-चप्पल बनाना और उन्हें ठीक करना |
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एक बार कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा-स्नान का पर्व आया |
लोग बड़ी संख्या में गंगाघाट की ओर जा रहे थे |
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लेकिन रैदासजी की तो दुनिया ही अलग थी |
वे अपने काम में रमे रहते और
मधुर स्वर में भजन गाया करते |
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एक बहिन रैदास के पास अपनी चप्पल ठीक कराने आई तो पूछा -
" सब गंगा स्नान करने जा रहे हैं भगतजी !
मैं भी जा रही हूं | आप नहीं जाओगे क्या ?
संत रैदास ने जूतों के ढेर की ओर इंगित कर कहा -
" यह देखो, इतना सारा काम ले रखा है |
समय पर सबको देना है मैं तो यहीं अपना काम करता-करता गंगा मां
के भाव-दर्शन कर लूंगा |"
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वह बहिन गंगा स्नान करके लौटी तो
रैदास भक्त से फिर मिलने आई |
मन से काफी निराश थी |
रैदास ने भजन पूरा कर उससे निराशा का कारण पूछा तो बोली -
" गंगा की धारा में डुबकी लगा रही थी |
न जाने कैसे हाथ का कंगन पानी में ही छूट गया |
गई थी धर्म लाभ कमाने |
सोने के कंगन गंवा कर आई हूं |
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मन और भावों से बहुत साफ़ थी वह बहिन |
लेकिन स्वर्णाभूषण खो जाने का गम गहरा था |
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रैदास ने उसके दुःख को देखा |
फिर अपना हाथ पास में रखी कठौती
( चमड़ा भिगोने के लिए पानी से भरा पात्र )
में डाला और
सोने के दो कंगन निकाल कर बोले -
" देखो, कहीं यह तो नहीं ?
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बहिन की आंखें खुशी से चमक उठी |
वह बोली -- हां, भगतजी !
यही हैं मेरे कंगन,
लेकिन ये तो बहती गंगा में गिरे थे....
यहां आपकी कठौती में कैसे ....?
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रैदास ने कहा -
" मन है चंगा तो कठौती में गंगा !!!
मन को चंगा रखो तो जहां हो,
वहीँ तीर्थस्थान का लाभ मिल जाएगा |"
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तभी से यह कहावत चल पड़ी |
- आचार्य श्री महाप्रज्ञजी

४ तरह के व्यक्ति


प्रसिद्धि विजय दिलाती है |
जो प्रसिद्धि सहज अपने गुणों से मिलती है,
वह अच्छी होती है |
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उत्तम व्यक्ति अपने गुणों से प्रसिद्ध होता है |
पिता के नाम से जो प्रसिद्धि पाता है,
वह मध्यम व्यक्ति है |
मामा के नाम से जो प्रसिद्धि पाता है,
वह व्यक्ति अधम है |
स्वसुर के नाम से जो प्रसिद्ध होता है,
वह अधमाधम है |

पालर है या बाकल ?

पालर है या बाकल ?
आचार्य कालूगणी के सानिध्य में मुनि नथमल करीब ६ वर्ष रहे |
उस अवधी में जब कभी पालर ( मीठा ) और बाकल ( खारा ) पानी का निर्णय करना होता,
तब साध्वी जयकंवरजी बाल मुनि नथमल से कहती -
" नान्हा साधुजी आओ, देखो, पानी पालर है या बाकल ?"
नथमल के संसार पक्षीय घर में कुण्ड थी |

जिसकी आज जरूरत थी

महावीर भगवान की २६०० वीं जयंती पर आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी द्वारा रचित -
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जिसकी आज जरूरत थी उसने क्यों पहले अवतार लिया ?
मंद चांदनी चंदा की क्यों सूरज को उपहार दिया ?
जिसकी आज.........
१. तुम आये तब इस धरती ने अपना रूप संवारा था,
मनुज-एकता की वाणी से उसको मिला सहारा था |
मानव अपना भाग्य विधाता पौरुष को आधार दिया |
जिसकी आज .....
२. जटिल समस्या के इस युग को उस युग से कैसे तोलें,
हिंसा से बहरी दुनिया में बोलें तो कैसे बोलें |
पोत कहां वह जिससे तुमने इस सागर को पार किया ?
जिसकी आज.....
३. करुणा का जल सूख रहा है, दुर्लभ पीने का पानी,
बना रहा बाज़ार आज के ज्ञानी को भी अज्ञानी |
भोगवाद के महारोग का प्रभु कैसे उपचार किया ?
जिसकी आज.....
४. उतरो, उतरो हे करुणाकर! हृदयांगण में तुम उतरो,
अभय-मन्त्र के उद्गाता अणु-युग के भय को दूर करो |
मैत्री की निर्मल धारा ने शान्ति-शोध को द्वार दिया |
जिसकी आज.....
५. ऋद्धि-सिद्धि का वर दो, वर दो, वर्धमान का पद पाएं,
सहनशील बन विक्रमशाली महावीर हम बन पाएं |
अनेकांत ने निराकार को पल भर में आकार दिया |
जिसकी आज जरूरत थी उसने क्यों पहले अवतार लिया ?
लय : बाजरे री रोटी पोई

सबसे मैत्री

गणधर गौतम पूछते जा रहे थे, 
वीर प्रभु बताते जा रहे थे -
गौतम ! मैं पहला पारणा एक ब्राह्मण के यहाँ किया, 
क्योंकि क्षत्रिय और ब्राह्मण में समन्वय करना चाहता था |
मेरे चारों ओर तुम लोग भी ब्राह्मण ही हो |
फिर, नारी-जाति के उत्थान के लिए १७५ दिन तक भोजन ग्रहण नहीं किया,
चंदनबाला के हाथ से भिक्षा ली |
दास-प्रथा पर मेरा अहिंसक प्रयोग था |
मेरी समता में पशु-पक्षियों का मूल्य कम नहीं है |
चंडकौशिक सर्प मुझे डसता रहा और मैं उसे प्रेम से देखता रहा |

मेरा अध्ययन

मेरा अध्ययन -
पूज्य कालूगणी कहा करते थे -
" बातेरी की बिगड़े, जो बातूनी होता है,
बातों ही में रस लेता है,
पढ़ने में रस नहीं लेता, वह बिगड़ जाता है |"
आचार्य श्री तुलसी मुझे समझाते -
" अभी तुम् बातें करोगे तो जीवन भर दूसरों के नियंत्रण में रहना होगा |
इस समय अध्ययन करोगे तो बड़े होने पर स्वतंत्र हो जाओगे |
फिर चाहे कितनी बातें करना, कोई टोकनेवाला नहीं होगा |"
सचमुच आकर्षण की धारा बदल गई |
मन अधिक से अधिक ज्ञानार्जन के लिए उत्सुक हो गया |

मेरे शिक्षा गुरु

मेरे शिक्षा गुरु 
आचार्य श्री तुलसी मेरे शिक्षा गुरु थे |
मुझे दुसरे साधू भोला समझते थे |
मैं भोला अवश्य था,
पर वे जितना समझते थे उतना नहीं था |
कपट, प्रपंच, छलना और प्रवंचना से मुझे बहुत घृणा थी |
मैं सबके प्रति निश्छल व्यवहार करना पसंद करता था |
मैंने अपने लिए सफलता के कुछ सूत्र निश्चित किये थे |
१. मैं ऐसा कोई काम नहीं करूँगा, जो मेरे विद्या गुरु को अप्रिय लगे |
२. मैं ऐसा कोई काम नहीं करूँगा, जिससे मेरे विद्या गुरु को यह सोचना पड़े कि
मैंने जिस व्यक्ति को तैयार किया, वह मेरी धारणा के अनुरूप नहीं बन सका |
३. मैं किसी भी व्यक्ति का अनिष्ट चिंतन नहीं करूँगा |
मेरी यह निश्चित धारणा हो गई थी -
दुसरे का अनिष्ट चाहनेवाला उसका अनिष्ट कर पाता है या नहीं कर पाता,
किन्तु अपना अनिष्ट निश्चित ही कर लेता है |

कौन करे आंख बंद ?

कौन करे आंख बंद ?
कुछ व्यक्ति सोचते हैं 
- ध्यान करने में कौन सा रस है ?
आँख बंद करने में कौन सा रस है ?

आँख जगत को देखने के लिए है |
कितने सुन्दर मकान, पेड़ और मनोहर पदार्थ हैं |

जब तक बाहरी चीजों में रस है |
जब बाहरी आकर्षण से मुक्ति पा लेते हैं 
तब ध्यान का आकर्षण बनता है |
- आचार्य श्री महाप्रज्ञजी 

कर्म बड़ा बलवान ???

" हम क्या करें ? कर्म में ऐसा ही लिखा था |"
" सब कुछ कर्म ही करता है |"
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इस मिथ्या धारणा ने अनेक भ्रांतियां पैदा की है |
इस धारणा ने 
गरीबी,
बीमारी,
दुर्व्यवस्था
और
अज्ञान को बढाने में सहारा दिया है |
कर्मवाद व्यापक सिद्धांत है |
कालवाद,
स्वभाववाद,
और
नियतिवाद --
ये इतने व्यापक नहीं है,
जितना व्यापक है
" कर्मवाद "

इससे आदमी के पुरुषार्थ का दीप बुझ जाता है |
वह जाने-अनजाने इस अन्धकार में भटक जाता है |
वह मानने लग जाता है कि
मैं असहाय हूं |
मैं कुछ नहीं कर सकता |
जैसा पहले का कर्म-फल है,
वैसा ही मुझे प्राप्त होता रहेगा |
व्यक्ति के मन में यह संस्कार सहज रूप में जम जाता है
कि मैं कुछ भी नहीं हूं |
सब कुछ करनेवाला है कर्म |

मनुष्य में कुछ विशेषताएं होती हैं |
उसमें कुछ विशेष गुण हैं |
ज्ञान,
दर्शन,
चारित्र,
शक्ति,
क्षमता,
कर्तृत्व ---
ये उसके गुण हैं |

बहुत बार ऐसा होता है कि
सही बात को गलत समझ लिया जाता है
और
गलत बात को सही समझ लिया जाता है |
भ्रांतियां अनेक स्थानों पर हो सकती है ---
सुनने में भ्रान्ति,
समझने में भ्रान्ति,
व्याख्या करने वाले में भ्रान्ति |
इन भ्रांतियों के कारण सही बात भी गलत बन जाती है |
और
गलत बात भी सही बन जाती है |

ज्योत से ज्योत जलाते चलो

‎' गीता ' का अर्जुन कुरुक्षेत्र में समरांगण में क्लीव होता है 
तो ' सम्बोधि ' का मेघकुमार साधना की समर भूमि में क्लीव बनता है |
' गीता ' के गायक योगिराज कृष्ण हैं 
और 
' सम्बोधि ' के गायक है 
भगवान महावीर |
अर्जुन का पौरुष जाग उठा
कृष्ण का उपदेश सुनकर
और
महावीर की वाणी सुन मेघकुमार की आत्मा चैतन्य से जगमगा उठी |
दीपक से दीपक जलता है |
एक का प्रश्न दुसरे को प्रकाशित करता है |
मेघ ने जो प्रकाश पाया,
वही प्रकाश यहाँ व्यापक रूप में है |
कभी-कभी ज्योति का एक कण जीवन को
ज्योतिर्मय बना देता है |

चूहों की समस्या से मुक्ति पाने के १०० उपाय

चूहों की समस्या से मुक्ति पाने के १०० उपाय
---
रसोई में चूहे बहुत थे |
महिला चूहों से परेशान थी |
महिला ने पति को परेशानी बताई |
---
पति ने बाजार से एक पुस्तक खरीद कर पत्नी को दी,
जिसमें चूहों की समस्या से मुक्ति पाने के १०० उपाय लिखे हुए थे |
पत्नी ने रसोईघर में पुस्तक को एक आसन पर जमाकर रख दिया |
रसोई बंद कर दी और
आश्वस्त होकर निकल गई कि
रात भर में यह पुस्तक चूहों की समस्या हल कर देगी |
---
सवेरे उसने रसोईघर खोला तो
पुस्तक के पन्ने कुतरे हुए इधर-उधर पड़े हैं |
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ज्ञान का महत्व तभी है,
जब उसे जीवन-व्यवहार में लाया जाए |
- आचार्य श्री महाप्रज्ञजी 

अलग-अलग घेरों में पलती जिंदगी


अलग- अलग घेरों में पलती ज़िन्दगी -
कुछ माता-पिता अपने बच्चों को अपनी ज़िन्दगी का अन्तरंग हिस्सा नहीं बनाते |
उनका जीवन अपने लिए होता है |
बच्चों को अपनी प्राइवेसी में बाधक मानते हैं |
इसलिए समय भी कम देते हैं,
ऐसे लोग आर्थिक दृष्टि से संपन्न भी होते हैं |
वे बच्चों की जायज-नाजायज़ मांगों को पूरा कर देते हैं |
जीवन के यथार्थ से उनको परिचित नहीं कराते,
जीवन कैसे जीया जाता है ?
पारिवारिक संबंधों में मधुरता कैसे आती है ?
बड़ों के प्रति कर्तव्यों का निर्वाह कैसे होता है ?
छोटो को कैसे साथ लेकर चलना ?
मित्रों और परिचितों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए ?
केवल अपने बारे में सोचने वाले माता-पिता अपने बच्चों को न जीवन का बोध दे सकते हैं
और न सामजिक बना सकते हैं |
एक बच्ची ब्रेकफास्ट करने आई
मनचाहा नाश्ता नहीं मिला, वह उठकर चली गयी
और अपने कमरे में जाकर सो गयी
परिवार के लोगों में, यहाँ तक कि उसकी माँ में भी हिम्मत नहीं कि वह अपनी लाडली बेटी के रूठने का कारण भी पूछे,
ऐसी हरकत के लिए डांटने का तो प्रश्न ही नहीं उठता |
सब को भय है कि डांट सहन न कर पाने से बच्ची कोई गलत कदम न उठा ले |
बच्चा हो या बच्ची हो, इतनी असहिष्णुता में परिवार के साथ समरस होने की कल्पना ही नहीं की जा सकती |
ऐसी दशा में युवा वर्ग के मादक पदार्थों और व्यसनों की तरफ जाने की संभावना बढ़ जाती है |

आलोचना


जहां हिंसा है, वहां धर्म नहीं है -
भगवान् महावीर की वाणी का यह शाश्वत विचार है |
गृहस्थ नाना प्रकार के आरम्भ-समारंभ करता है,
पर उसे धर्म समझना उचित नहीं है |
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यदि मोह, राग या अव्रतसेवन की प्रवृत्ति को धर्म माना जाए
तो उससे हमारा दृष्टिकोण अशुद्ध हो जाता है |
यदि मोह राग की प्रवृत्ति तथा असंयम का आचरण करने-कराने को
धर्म समझा हो तो उसकी आलोचना कर लेनी चाहिए |
---
इससे सम्यक्त्व और चारित्र दोनों ही दूषित होते हैं तथा
पाप कर्मों का बंधन होता है |
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श्रावक के व्यावहारिक जीवन में मैत्री व प्रमोद भावना का संस्कार होना चाहिए |
ईर्ष्या की वृत्ति से मनुष्य की विवेक चेतना लुप्त हो जाती है |
इस स्थिति में उसका चिंतन बिलकुल नकारात्मक हो जाता है |
वह दूसरों की प्रगति को सहन नहीं कर सकता |
उन पर मिथ्या आरोप लगाकर उनके विकास में बाधक बनने का प्रयास करता है |
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इससे सम्यक्त्व और चारित्र दोनों ही दूषित होते हैं तथा
पाप कर्मों का बंधन होता है |
१२ व्रतों की सही आराधना के लिए इस प्रकार के पापों की आलोचना करना जरुरी है |
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यदि गुणवान मनुष्यों के प्रति ईर्ष्या की भावना जाग्रत हुई हो,
उन पर दोषारोपण किया हो तथा
ईर्ष्या और मात्सर्य से ग्रसित होकर मैंने निंदा की हो
तो मैं उसका " मिच्छामि दुक्कड़म् " करता हूं |

आराधक और विराधक

आराधक और विराधक 
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इन दोनों के तात्पर्य को समझने के लिए दो शब्द और ज्ञातव्य है -
आराधना और 
विराधना |
स्वीकार की गई अध्यात्म-साधना में सफल हो जाना,
उत्तीर्ण हो जाना आराधना है |
साधना-पथ में असफल-अनुत्तीर्ण हो जाना विराधना है |
साधना में सफल साधक आराधक और
असफल साधक विराधक कहलाता है |
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आराधना के तीन प्रकार है -
१. ज्ञान आराधना
२. दर्शन आराधना
३. चारित्र आराधना
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* इसका सम्बन्ध वर्त्तमान और भावी -
दोनों जन्मों के साथ जुड़ा हुआ है |
जो साधू और श्रावक वर्तमान जीवन में
ज्ञान, दर्शन और चारित्र की सम्यक आराधना करता है,
वह सदगति प्राप्त करता है |
अगले जीवन में पहले की अपेक्षा अधिक आत्मिक-विकास करता है |
----------------------
जो ज्ञान, दर्शन और चारित्र की विराधना करता है,
वह विराधक बन जाता है |
उसकी भावी यात्रा दुर्गति की ओर ले जानी वाली होती है |
उसका भावी जीवन विकासशील नहीं होता |
भविष्य धुंधला हो जाता है |
इसलिए प्रत्येक समझदार धार्मिक व्यक्ति आराधक अवस्था में मृत्यु का वरन करना चाहता है |

वरदान बनी गुरु वाणी


वरदान बनी गुरु वाणी
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प्रसंग है सन २००९ !
लाडनूं चतुर्मास !
मैं गुरुदेव ( आचार्य श्री महाप्रज्ञजी ) के चरणों में पहुंची |
आचार्यवर की करुणामयी दृष्टि देखकर सहसा मेरे मन में आया -
क्यों न मैं अपनी आँखों के बारे में गुरुदेव से समाधान प्राप्त करूं |
लगभग ६ महीनों से लगातार वेदना मेरे लिए असह्य हो रही थी |
मैं गुरुदेव के सामने चुपचाप खड़ी रही |
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तभी गुरुदेव की सेवा में खड़े मुनिश्री किशनलालजी ने कहा -
" कुछ पूछना है, पूछ लो |"
तभी गुरुदेवश्री ने पुछवाया -
" क्या हुआ ?"
मैंने निवेदन किया -
" आंखों की वेदना ठीक नहीं हो रही है |"
गुरुदेव ने वत्सलतापूर्वक पुछवाया -
" कहां दिखाया, डाक्टर क्या कहते हैं ?"
मैंने कहा -
" डा. काला पानी बताते हैं |
पर दवाई से फर्क नहीं पड़ रहा है |"
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गुरुदेव ने असीम कृपादृष्टि बरसाते हुए फरमाया -
" ठीक है |"
कुछ क्षण रूककर दोनों हाथों से आशीर्वाद प्रदान करते हुए
फरमाया -
" ठीक है, जप का प्रयोग करो |"
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गुरु के आशीर्वाद अमृतमय वचनों का पान कर अपार आनंदानुभूति हुई |
गुरुवचनों पर दृढ विश्वास और संकल्प के साथ जप प्रयोग शुरू करने
के कुछ ही दिनों में आंखें ठीक हो गई |
सबको आश्चर्य हुआ |
ऐसा लगा कभी दर्द हुआ ही नहीं |
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पुनः डाक्टर को दिखाया |
रिपोर्ट में सब सामान्य था |
गुरुदेव की वाणी मेरे लिए वरदान बन गई |
सचमुच गुरुवचनों पर श्रद्धा निश्चित ही सुफल देने वाली होती है,
इसका साक्षात अनुभव हुआ |
- मुमुक्षु गुणश्री

स्वभाव और विभाव !


स्वभाव और विभाव !
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स्वभाव अवस्था - आत्मा की ओर ले जाने वाली अवस्था है,
धर्म की ओर ले जाने वाली अवस्था है,
सदगति की ओर ले जाने वाली अवस्था है |
विभाव अवस्था - पदार्थ की ओर ले जाने वाली अवस्था है,
और आगे जाएं तो नीचे की ओर ले जाने वाली अवस्था है |
----------------
जो हमारा स्वभाव है, वही अध्यात्म है |
* हम स्वयं कसौटी कर लें कि
कब-कब स्वभाव में रहते हैं और
कब-कब विभाव में रहते हैं |
---------------------------
क्षमा हमारा स्वभाव है |
क्रोध हमारा विभाव है |
जब हम क्षमा में रहते हैं,
शांत रस की अनुभूति में रहते हैं,
आनंद का जीवन जीते हैं |
-------------------------
जब-जब क्रोध, उत्तेजना, आवेश रुद्र्ता -
ये स्थितियां आती हैं,
हमारी शान्ति गायब हो जाती है,
आनंद और सुख गायब हो जाता है |
एक निकृष्ट-सा जीवन जीने की अनुभूति होने लग जाती है |

दर्द एक, अनुभूति अनेक

दर्द एक, अनुभूति अनेक
---
३ व्यक्ति हैं -
तीनों के फोड़ा हो गया |
क्या तीनों के समान दर्द हो रहा है ?
एक व्यक्ति दिन भर पीड़ा का रोना रोयेगा |
दूसरा अपना काम करेगा, उसे पचास प्रतिशत अनुभूति होगी |
तीसरा अन्यत्व अनुप्रेक्षा का साधक है, 
उसे दर्द की अनुभूति १० प्रतिशत भी मुश्किल से होगी |
- आचार्य श्री महाप्रज्ञजी 

काम, क्रोध, लोभ से क्या होता है ?

काम, क्रोध, लोभ से क्या होता है ?
शरीर हमें कितना प्रभावित करता है ?
यदि हम शरीर के प्रभाव से बहुत प्रभावित रहेंगे 
तो ( आत्मा भिन्न : शरीर भिन्न ) भेद विज्ञान का कोई अर्थ नहीं होगा |
शरीर के ३ दोष - वायु, पित्त और कफ बहुत प्रभावित करते हैं |
हमारी प्रवृत्तिओं का सबसे बड़ा संचालक तत्व है - वायु |
काम, शोक और भय से वायु कुपित होता है |
क्रोध से पित्त कुपित होता है |
लोभ से कफ कुपित होता है |
धर्म या कर्म में जो बाधाएं हैं,
वे इन्ही सब कारणों से आते हैं |

- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी 

धन से भी धर्म होता नहीं

धन से भी धर्म होता नहीं
-------------------------
धर्म के साधन दो ही हैं -
संवर और निर्ज़रा या त्याग और तपस्या |
---
यदि धन के द्वारा धर्म होता तो महावीर की धर्मदेशना विफल नहीं होती |
भगवान को वैशाख शुक्ला १० को केवलज्ञान उत्पन्न हुआ |
सभा में केवल देवताओं की उपस्थिति थी,
मनुष्य कोई नहीं था |
भगवान ने धर्मदेशना दी |
देवताओं ने धर्म अंगीकार नहीं किया |
कोई साधू या श्रावक नहीं बना |
इसलिए माना जाता है कि
भगवान की पहली देशना विफल हुई |
---

यदि धन से धर्म होता तो देवता भी धर्म कर लेते |
देवताओं से व्रत का आचरण होता नहीं
और धन से भी धर्म होता नहीं |
---

भगवान की वाणी तब सफल हुई,
जब मनुष्यों ने व्रत ग्रहण किया, साधू और श्रावक बने |
---

कोई समर्थ व्यक्ति किसी दरिद्र को धन देकर सुखी बना देता है,
वह सांसारिक उपकार है |
सांसारिक उपकार से संसार की परंपरा चलती है
और आध्यात्मिक उपकार से संसार का अंत होता है
अर्थात मुक्ति होती है |
---

कोई लाखों रुपये देकर मरते हुए जीवों को छुड़ाता है,
यह संसार का उपकार है |
इससे आत्ममुक्ति नहीं होती |
( कोई जीव छुड़ावे लाखां दाम दे, ते तो आपरो सीखायो नहीं धर्म हो |
ओ तो उपगार संसार नो, तिणसुं कटता न जाण्या आप कर्म हो ||
~ आचार्य भिक्षु द्वारा रचित दोहा )

- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी 

अहंकार किस बात का ?

अहंकार किस बात का ?
अहंकार-मुक्ति का सूत्र -

मंत्री मुनि मगनलालजी स्वामी ने मुझसे एक बार कहा -

" विदया का और गुरु-कृपा का अहंकार नहीं होना चाहिए |
हम मुनि हैं,
हम किस बात का अहंकार करें |
माँगना बहुत छोटा काम है,
हम रोटी के लिए दुसरे के सामने हाथ पसारते हैं |
फिर अहंकार किस बात का ?
न जाने कितनी बार यह जीव बेर की गुठली बनकर पैरों से रौंदा जा चूका है |
फिर अहंकार किस बात का ?"

- इस बात ने मेरे मन की गहरी परतों को छू लिया |

अहंकार मेरी मृदुता पर कभी आक्रमण नहीं कर सका |

- आचार्य श्री महाप्रज्ञजी 

पृथ्वी तत्व, जल तत्त्व

पृथ्वी तत्व
-----------
पृथ्वी तत्व का स्थान है - शक्ति केंद्र
( मूलाधार चक्र ) |
अस्थि, मांस, त्वचा, रोम और रक्तवाहिनियां - -
इन पांचों का पृथ्वी तत्व से सम्बन्ध है |
कनिष्ठा अंगुली को अंगूठे से दबाने पर
शरीर में पृथ्वी तत्व का संतुलन होता है |
---------------
यकृत, आमाशय और प्लीहा पर इस तत्व का नियंत्रण है |
इसकी अधिकता से कफ़, श्वास में भारीपन, आलस्य,
उल्टी, पेट में कृमि और चक्षु रोग आदि होते हैं |
यह तत्व यदि पूर्ण रूप से संतुलित हों तो
व्रण, चमड़ी, हड्डी - सब ठीक हो जाते हैं |
----------------------------------------
२१ दिसंबर से २० मार्च तक शरीर में पृथ्वी तत्व की
प्रधानता रहती है |
- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी
==========================================
जल तत्व
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जल तत्व का स्थान है -
स्वास्थ्य केंद्र ( स्वाधिष्ठान चक्र )
कान, सिर के बाल और हड्डियों में
जलीय परमाणुओं की विद्दमानता है |
---
अनामिका अंगुली को अंगूठे से दबाने पर
शरीर में जलतत्व का संतुलन होता है |
---
आंसू, कफ़, थूक, रक्त, प्रस्वेद, श्लेष्म आदि
पर इस तत्व का नियंत्रण है |
---
इसकी अधिकता से गैस, ह्रदय पर असर,
मुख फीका, हकलाना, चमड़ी में कम्पन आदि रोग होते हैं |
---
इस तत्व पर नियंत्रण होने से भूख-प्यास शांत होती है और
मैत्री का विपाक होता है |
---
२१ मार्च से २० जून तक शरीर में जल तत्व की प्रधानता रहती है |
- आचार्य श्री महाप्रज्ञजी

बुद्धिमान को इस दुनिया में पैदा ही नहीं करता

बुद्धिमान को इस दुनिया में पैदा ही नहीं करता - १ 
---
मैंने ३०-४० वर्ष पहले एक कविता लिखी थी |
" मेरे प्रभु !
मैं भगवान होता तो बुद्धिमान को इस दुनिया में पैदा ही नहीं करता |"
बात किसी को अटपटी लग सकती है, 
किन्तु यह एक सचाई है कि बहुत सारी समस्याएं बुद्धिमान लोग पैदा करते हैं |
बुद्धि के साथ भावात्मक विकास की बात और जुड़नी चाहिए |
इससे चरित्र का निर्माण होगा |
कोरी बुद्धि एक समस्या को सुलझाती है
और
दूसरी नई समस्या पैदा कर देती है |
एलोपैथी दवा का सेवन करने पर भी ऐसा ही होता है |
उसका रिएक्शन भी होता है |
औषधि वह जो रोग को मिटाए
और नया रोग पैदा न करे | 

================================
भावात्मक विकास होगा आत्मज्ञान से |
भावों के साथ आत्मा का सम्बन्ध निकट का है,
बुद्धि का सम्बन्ध दूर का है |
परिवार और समाज -
की बहुत सारी समस्याएं भावों पर अनियंत्रण के कारण हो रही है |
असहिष्णुता बढ रही है |
मन के प्रतिकूल कोई बात आदमी बर्दाश्त नहीं कर पाता |
तत्वज्ञान हो तो सहनशक्ति का विकास हो सकता है | 

दूसरा स्तर है -
" मानस ज्ञान "
जो इन्द्रियों द्वारा प्रदत्त है,
इन्द्रियों के द्वारा मिला है,
उनका मन के साथ विश्लेषण करते हैं |
तीसरा स्तर है - 
" बौद्धिक ज्ञान "
इसके द्वारा हम निर्णय करते हैं,
चिंतन करते हैं |
एक तरह से बुद्धि का व्यवसाय होता है |
चेतना का चौथा स्तर है -
" भाव "
यह बुद्धि से आगे की बात है |
इन्द्रियों से परे मन है,
मन से परे बुद्धि है
और जो बुद्धि से परे है,
वह है परम सत्य | 

बुद्धि परम सत्य तक नहीं पहुंचती |
परम सत्य तक पहुंचाता है -
" आत्मज्ञान "
इसे हम प्रज्ञा कह सकते हैं |
प्रज्ञा से अतीन्द्रिय ज्ञान का प्रारम्भ होता है |
सब कुछ इन्द्रिय ज्ञान की सीमा में है,
यह समझना भूल है |
इन्द्रियों से आगे है -
अतीन्द्रिय चेतना |
इसमें न इन्द्रियों की जरूरत है,
न मन की जरूरत,
न बुद्धि की जरूरत |
यहां तो अपने भीतर से ही ज्ञान प्रकट होता है | 

हमारे भीतर कितना ज्ञान है,
इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है |
लेकिन जब तक उस ज्ञान का स्रोत नहीं खुलता,
पूरी क्षमता प्रकट नहीं हो सकती |
वह स्रोत खुलता है -
साधना के द्वारा |
पढ़ाई से जानकारी बढ सकती है,
ज्ञान नहीं बढ सकता | 

एक होता है मूर्खता को मिटानेवाला ज्ञान 
और 
दूसरा होता है मूढता को मिटाने वाला ज्ञान |
मूर्खता और मूढता दोनों अलग बातें हैं |
जो नासमझ है, उसे मूर्ख कहते हैं |
जो सब कुछ जानते हुए भी गलत काम करता है,
वह है मूढ़ |
विद्यालय और कॉलेज मूर्खता को मिटा सकते हैं,
किन्तु मूढता को मिटाने का काम तो धार्मिक ही कर सकता है |
धार्मिक भी वही, जो धर्म के मर्म को समझता है |कोई भी बड़ी बुराई अनजाने में नहीं होती |
छोटी बुराई तो आदमी अनजान या भूलवश कर लेता है,
किन्तु बड़ी बुराई जानबूझकर की जाती है |
ऐसा मोह के दबाव के कारण होता है |