Thursday, July 11, 2013

कस्तूरी कुंडल बसै मृग ढूंढे वन माहिं !!!


कस्तूरी कुंडल बसै मृग ढूंढे वन माहिं !!!
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हिमालय की तराई वाले क्षेत्रों में कस्तूरी मृग पाया जाता है |
उसकी नाभि में एक ग्रंथि होती है,
जिससे बहुत सुगंध आती है |
यह तेज सुगंध मृग को बेचैन कर देती है और
वह उसकी तलाश में मारा-मारा फिरता है |
है वह अपने पास और वह उसे बाहर ढूँढता है |
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आनंद के सन्दर्भ में यही स्थिति मनुष्य की है |
सुख के सारे साधन मनुष्य ने ही बनाए
और बनाता जा रहा है |
क्या वह सुखी बन पाया ?
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मैंने तो वातानुकूलित कक्ष में डनलप के गद्दे पर
चीखते-चिल्लाते लोगों को देखा है |
कभी-कभी मंगल-पाठ सुनाने के क्रम में
ऐसे दृश्य देखने में आ जाते हैं |
क्या अर्थ रहा जीवन भर भागादौड़ी कर सुख-सुविधा के साधनों को जुटाने का ?
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भीतर का आनंद प्रकट नहीं हुआ तो
पदार्थजनित सारे सुख निरर्थक सिद्ध होंगे |
अगर भीतर आनंद का स्रोत फूट रहा है
तो राजमहल और जंगल दोनों एक-सा सुख देंगे |
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राम चौदह वर्ष के लिए वनवासी होने जा रहे थे |
छोटे भाई भरत उनसे प्रार्थना करते हैं कि
आप राजकाज करें,
वनवास आपकी जगह मैं भोग लूंगा |
लेकिन राम भरत की बात को स्वीकार नहीं करते |
श्री कृष्ण का जीवन भी बहुत आराम का नहीं रहा |
तत्कालीन परिस्थिति में उन्हें बहुत कष्ट उठाने पड़े |
यह तो उनका राजनीतिक कौशल था और
भीतर का आनंद और शक्ति थी
जो उन्हें हर समय हंसता-खिलता बनाए रखती थी |
महावीर का जीवन तो कष्टों की पूरी गाथा है |
लेकिन कष्ट और कठिनाइयां उन्हें कभी विचलित नहीं कर सकी |
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बाहर के सुख पर भरोसा नहीं किया जा सकता |
गरमी के महीने में बिजली चली गई और
ए.सी., कूलर अथवा पंखा बंद हुआ नहीं कि
आप कमरे से बाहर निकल जाते हैं |
भीतर का ज्ञान, भीतर का आनंद और
भीतर की शक्ति प्रकट हो जाए तो
बाहर की सारी निर्भरता समाप्त हो जायेगी |
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भीतर का ज्ञान, आनंद और शक्ति को प्राप्त करने
के लिए भीतर में जाने का अभ्यास करना होगा |
पहले भीतर में प्रवेश करने का अभ्यास,
फिर वहां अधिक से अधिक देर तक रहने का
अभ्यास --
यह क्रम सध जाने के बाद बाहर की रूचियां
धीरे-धीरे अपने आप कम होने लगेंगी |
एक के बार भीतर जाने का स्वाद चख लिया तो
फिर बाहर का हर स्वाद आपको फीका लगने लगेगा |
फिर आप बार-बार अपने भीतर जाना चाहेंगे |
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इसी की चरमावस्था है समाधि,
जो सिद्ध योगी लोग लगाया करते हैं |
सामान्य गृहस्थ योगी वाली क्लिष्ट योग साधना नहीं कर सकता |
किन्तु अपने शरीर, मन और भावों के बारे में
उसे पूरी जानकारी होनी चाहिए,
जिससे जीवन में आनेवाली विघ्न-बाधाओं
से पार पा सकें |


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