Monday, July 30, 2012

आदमी अपने भाग्य को कैसे बढ़ा सकता है ?


आदमी अपने भाग्य को कैसे बढ़ा सकता है ?
आगम साहित्य में उत्तर दिया गया - 
पाणाणुकंम्पयाए, भूयाणुकंपयाए, जीवाणुकम्पयाए भुज्जो-भुज्जो सायं उवचिणाई |
जिस व्यक्ति में हर प्राणी के लिए अनुकम्पा का भाव होता है,
वह व्यक्ति अपने भाग्य को बढ़ा सकता है | 
~ आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी की ' महाप्रज्ञ ने कहा भाग - ३९ ' से 
( महाप्रज्ञ ने कहा - पूज्य गुरुदेव के प्रवचनों का संकलन है )

Friday, July 20, 2012

सन्यासी कैसे-कैसे ?

कुछ बाबा लोग हैं जो स्वयं को साधू और सन्यासी कहते हैं |
धन को सब बुराइयों की जड़ बताते हैं 
और चढावे के लिए लालायित भी रहते हैं |
वे भक्तों को मालामाल होने का आशीर्वाद देते हैं 
और आश्रम में दानपेटिका रखवाते हैं |
स्वयं दक्षिणा के आकांक्षी हैं 
और भक्त को भी आशीर्वाद देते हैं कि 
जाओ, तुम् पर दौलत की बरसात होगी |
बड़ी विरोधाभासी बात है |
जो स्वयं पाने को आतुर है,
वह दुसरे को क्या देगा ?

- आचार्य श्री महाप्रज्ञजी 

कैसे बदलें ?.....अपने आप को

अपने आप को बदलना चाहते हो -
तो एक व्रत ले लो,
"हमारी जबान से किसी के प्रति 
निंदा, चुगली और किसी को नीचा दिखाने वाला शब्द नहीं निकलेगा |"
यह आपके जीवन को रूपांतरित करने में बहुत बड़ी भूमिका अदा करेगा |

विवाद ....मौन

जहां विवाद बढे,
अपनी आत्मरक्षा करें |
आत्मरक्षा का उपाय ?
उपाय है - मौन हो जाना |
विवाद वहीँ समाप्त हो जायेगा |

नहीं चाहिए ....तुम्हारी गालियाँ


भगवान् बुद्ध के पास एक आदमी आया 
और 
बड़ी देर तक अपशब्दों की बौछार करता रहा |
आखिर गालियाँ देते-देते थक गया |
दस गाली के बदले अगर एक गाली उत्तर में मिल जाए तो अगली बीस गालियों से स्वयं को लैस कर लेता है |
जोश दुगुना.....
उस आदमी ने बुद्ध से कहा -
" क्या बात है ?
तुम्हारी जीभ गायब हो गयी क्या ?
जवाब क्यों नहीं देते ?"
बुद्ध ने कहा -
" मैंने तुम्हारे अपशब्द स्वीकार ही नहीं किये तो क्या जवाब दूं ?"
उस व्यक्ति ने कहा -
" स्वीकार न करने का मतलब ?"
बुद्ध ने कहा -
" दूसरों को भेंट देने की प्रथा तुम्हारे यहां भी होगी |
अगर एक थाल मिठाई भर कोई तुम्हारे पास जाता है
और
तुम् स्वीकार नहीं करते तो वह थाल कहां जाएगा ?"
गाली देने वाले ने कहा -
" जाएगा कहाँ, वह तो उसी के पास रह जाएगा,
जो देने आया था |"
बुद्ध बोले -
" तुम्हारी गालियाँ भी तुम्हारे पास ही रह गई,
क्योंकि मैंने उसे स्वीकार नहीं किया |"

थायराइड

थायराइड -
एक बहिन ने कहा - उसकी थायराइड ग्रंथि बहुत सक्रिय है |
वह परेशान थी |
उसे ब्लू रंग का ध्यान कराया गया |
उसकी सक्रियता कम हुई |
साथ-साथ बहिन कि परेशानी भी कम हो गयी |
हमारे शरीर में जितने भी ग्लैंड्स है,
उन सबका अपना रंग है |
जितने चैतन्य केन्द्र हैं,
उन सबका अपना एक रंग है |
ये सारे रंग प्रभावित करते हैं |
~ आचार्य श्री महाप्रज्ञजी की पुस्तक " अपने घर में पृष्ठ संख्या ६५ " से

संवाद -- तालाब - नदी का

"तुम्हारे पास जल की इतनी बहुमूल्य और मीठी संपत्ति है 
और 
तुम उसे ले जाकर खारे समुद्र में बहा देती हो |
यह कौन सी समझदारी है ?
मुझे देखो,
मैं अपनी संपत्ति को स्वयं में समेटे हुए हूं |
मेरा जल कभी खारा नहीं होता |" 
- तालाब ने बहती हुई नदी से कहा |
" भाई तालाब ! तुम्हारा चिंतन तुम् जानो,
मैं देने में विश्वास करती हूं,
संग्रह में नहीं |"
~ नदी ने कहा |

समय बीता !!!
मौसम बीता !!!
संग्रहवृत्ति में विश्वास रखनेवाला तालाब शनै: शनै: क्षीण होता गया
और
एक दिन ऐसा आया,
जब उसमें थोड़े से कीचड़ के सिवाय कुछ शेष नहीं बचा |
नदी ने दम तोड़ते हुए तालाब से कहा --
" भाई ! तुम् तो कुछ दिन पहले बहुत संपन्न और स्वस्थ थे |
तुम्हारा वह समृद्ध रूप अब कहां चला गया ?"
तालाब में अब इतनी शक्ति भी नहीं बची थी कि
नदी के प्रश्न का उत्तर दे पाता |
व्यक्ति आता है
और
चला जाता है |
जो आपके पास ज्ञान है,
अनुभव है;
अगर उसे आप अपने ही पास रखेंगे तो तालाब की तरह हालत हो जायेगी |
अपने मित्रों, समाज, देश में उस ज्ञान का सदुपयोग करें |

अंतर रेडियो और टीवी का

बच्चा - मां ! रेडियो और टीवी में क्या अंतर है ?
मां - बेटा, जब मैं और तुम्हारे पापा भीतर लड़ते हैं 
तो वह रेडियो है |
लड़ते हुए जब घर से बाहर आ जाते हैं तो वह टीवी है |
हमारे २ जगत हैं |
स्थूल जगत = बाहर का जगत |
सूक्ष्म का जगत = भीतर का जगत |
मन भीतर की चीज है |
मन को ठीक से समझा नहीं जाता तो वह समस्या पैदा करता है |
भीतर की लड़ाई जब बाहर सड़क पर जाती है,
तो उसे दुनिया देखती है |
भीतर की बात जब भीतर ही रहती है
तो दूसरों को नहीं,
स्वयं को पता चलता है |

समय बड़ा बलवान !!!

मैंने देखा है,
शायद आपने भी देखा होगा |
४०-५० वर्ष पहले जो आकाश को छूते थे,
आज धरती पर भी वे लड़खड़ा रहे हैं |
उनका वह धन, वह ऐश्वर्य जाने कहाँ खो गया |
जिनका नाम पहली पंक्ति में आता था,
उन्हें आज कोई जानता भी नहीं है |
जिनका वैभव इन्द्र के ऐश्वर्य को भी मात करता था,
उनके शाही महलों में अब किराए की दुकानें चलती है |
कारण ?
समय !!!
समय का अंतर |
समय परिवर्तनशील है,
वह किसी की प्रतीक्षा नहीं करता |
किसी को माफ नहीं करता |
न् झोपडी पर रहम !!!
न् महल का लिहाज !!!
~आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी