"तुम्हारे पास जल की इतनी बहुमूल्य और मीठी संपत्ति है
और
तुम उसे ले जाकर खारे समुद्र में बहा देती हो |
यह कौन सी समझदारी है ?
मुझे देखो,
मैं अपनी संपत्ति को स्वयं में समेटे हुए हूं |
मेरा जल कभी खारा नहीं होता |"
- तालाब ने बहती हुई नदी से कहा |
" भाई तालाब ! तुम्हारा चिंतन तुम् जानो,
मैं देने में विश्वास करती हूं,
संग्रह में नहीं |"
~ नदी ने कहा |
समय बीता !!!
मौसम बीता !!!
संग्रहवृत्ति में विश्वास रखनेवाला तालाब शनै: शनै: क्षीण होता गया
और
एक दिन ऐसा आया,
जब उसमें थोड़े से कीचड़ के सिवाय कुछ शेष नहीं बचा |
नदी ने दम तोड़ते हुए तालाब से कहा --
" भाई ! तुम् तो कुछ दिन पहले बहुत संपन्न और स्वस्थ थे |
तुम्हारा वह समृद्ध रूप अब कहां चला गया ?"
तालाब में अब इतनी शक्ति भी नहीं बची थी कि
नदी के प्रश्न का उत्तर दे पाता |
व्यक्ति आता है
और
चला जाता है |
जो आपके पास ज्ञान है,
अनुभव है;
अगर उसे आप अपने ही पास रखेंगे तो तालाब की तरह हालत हो जायेगी |
अपने मित्रों, समाज, देश में उस ज्ञान का सदुपयोग करें |