Wednesday, April 25, 2012

बहुत कठिन है डगर पनघट की

बहुत कठिन है डगर पनघट की
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बहुत कठिन है रूचि को मोड़ना |
क्रिकेट हो उस दिन धर्म- स्थान भी खाली मिलेंगे,
ऑफिस, सडकें खाली मिलेगी |
व्यक्ति खाना-पीना भूल जायेगा |
मां रोटी खाने के लिए कहती-कहती थक जाती है |
सामने से कोई चीज उठाकर ले जाय तो उस पर ध्यान नहीं जाए |
- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी 

Monday, April 16, 2012

चक्रव्यूह को कैसे तोडें ?

चक्रव्यूह को कैसे तोडें ?
एक भाव आया और एक तरह का रसायन बन गया 
और एक अलग भाव आया और फिर एक अलग प्रकार के भाव का निर्माण हो गया |
उस चक्र को कैसे पकडें और कहां से तोडें?
इसके लिए जरूरी है एक लंबी और अनवरत चलनेवाली साधना |
जो व्यक्ति अन्यत्व ( आत्मा भिन्न : शरीर भिन्न ) अनुप्रेक्षा की साधना में प्रवेश करेगा और
तीन महीने तक उसका अच्छा अभ्यास कर लेगा,
उसे अपनी शारीरिक स्थितियों से निपटने की कला आ जायेगी,
कष्ट पर से चेतना को हटाने का अभ्यास हो जाएगा |
~ आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी की पुस्तक " अपना दर्पण : अपना बिम्ब " से

लगे रहो सत्य की खोज में


वे ही व्यक्ति इस दुनिया में सफल होते हैं
और
वे ही अपना विकास करते हैं,
जो सत्य को खोजते रहते हैं |
जो यह मानकर बैठ जाते है
कि जो मैं जानता हूं,
वही सत्य है
या
जो पहले खोज लिया गया,
वही सत्य है,
इससे आगे और कुछ नहीं है,
वे जहां के तहां रह जाते हैं,
अपना विकास नहीं कर सकते |
सत्य की खोज में जहां लक्ष्मणरेखा खींच ली जाती है,
वहां कोई विकास नहीं हो सकता |
हमें विकास की प्रक्रिया को समझना है |
कुछ लोग रुढिवादी होते हैं |
रुढिवादी शब्द कुछ कड़ा है,
उन्हें अच्छा नहीं लगता,
इसलिए वे सिद्धांतवादी कहलाना पसंद करते हैं |
यह शब्द थोडा मुलायम और सम्मानजनक है |
ऐसे सिद्धांतवादी लोग सत्य के ठेकेदार बन जाते हैं |
वे नहीं जानते कि बुद्धि की भी सीमा है |
तुम्हारी बुद्धि में जितना समाया,
उतना तुम् जानते हो,
लेकिन सबकुछ जानने का दावा कैसे कर सकते हो ?
गागर में समुद्र कैसे समा सकता है ?
हमारा मन-मस्तिष्क एक गागर जितना ही तो है |
उसमें समस्त सारा ज्ञान कैसे समाहित हो सकता है ?
मैं सब कुछ जानता हूं,
यह समझकर बैठ जाना विकास को विराम लगा देने जैसा है |

महाप्रज्ञ अवतार

करुणा सागर लहराया रे, महाप्रज्ञ अवतार |
जिन शासन को चमकाया रे, महाप्रज्ञ अवतार ||
योगीश्वर ज्ञानी-ध्यानी, जग के अनुपम अवदानी |
अदभुत सौरभ महकाया रे, महाप्रज्ञ अवतार ||
कालू कर पाई दीक्षा, तुलसी से पाई शिक्षा |
निज प्रज्ञा को सरसाया रे, महाप्रज्ञ अवतार ||
नत्थू सा भोला बालक, वह बना संघ संचालक |
आरोहण पंथ दिखाया रे, महाप्रज्ञ अवतार ||
मुख से मन्त्राक्षर झरते, अमृत कण से घंट भरते |
सद्ज्ञान सिंधु गहराया रे, महाप्रज्ञ अवतार ||
शिशु के जैसी कोमलता, माता के सम वत्सलता |
ऋजुता का नीर बहाया रे, महाप्रज्ञ अवतार ||
वय नौ दशकों की मात्रा, तुम चले अहिंसा यात्रा |
पथ समाधान का पाया रे, महाप्रज्ञ अवतार ||
सम्मान अनगिनत पाए, गण को नव शिखर चढाऐ |
यह विश्व क्षितिज गुंजाया रे, महाप्रज्ञ अवतार ||
जिस भू पर संयम पाया, की वहीँ विसर्जित काया |
सरदारशहर ने पाया रे, महाप्रज्ञ अवतार ||
यह जग सपने की माया रे, महाप्रज्ञ अवतार |
तेरे पथ को अपनाएं, निज प्रज्ञा दीप जलाएं ||
है महाश्रमण का साया रे, महाप्रज्ञ अवतार |
युग-युग सन्देश रहेगा, जग को उद्बोधन देगा ||
यशगान अमरता पाया रे, महाप्रज्ञ अवतार |
करुणा सागर लहराया रे.......................  

पीड़ा कैसे कम करें ?

जितनी चंचलता उतनी पीड़ा,
जितनी चंचलता कम, उतनी पीड़ा कम |

आचार्य श्री तुलसी की सीख महाप्रज्ञजी को


गुरुदेव महाप्रज्ञजी -
मुनि नथमलजी ( आचार्य श्री महाप्रज्ञजी का पहले यही नाम था )
जोर से हँसते थे
गुरुदेव तुलसी ने कहा
" हंसिये ना हुसियार, हँसियाँ हलकाई हुवै
हँसियाँ दोष हज़ार, गुण जावै गहलो बजै "
होशियार आदमी हँसता नहीं है,
क्योंकि हंसने से हल्का पन आता है |
हंसने में हज़ारों दोष हैं |
उससे आदमी के गुण चले जाते हैं और
वह मुर्ख कहलाता है |

भय

भय
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स्थानांग सूत्र में ७ प्रकार के भय बताये गए हैं |
किन्तु भय ७ भी हो सकते हैं, 
७०० भी हो सकते हैं |

कोई आदमी जो बन्दुक, तलवार से नहीं डरता,
एक चुहिया या तिलचिट्टे से भी डर जाता है |

- आचार्य श्री महाप्रज्ञजी 

मनुष्य ऐसा क्यों करता है ?

मनुष्य ऐसा क्यों करता है ?
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मनुष्य का क्रोध उपशांत नहीं है,
इसलिए वह दूसरों को अपना शत्रु बना लेता है |
उसका मन शांत नहीं है,
इसलिए वह अपने को बड़ा और दुसरे को छोटा मानता है |
उसकी माया उपशांत नहीं है,
इसलिए वह दुसरे के साथ प्रवंचनापूर्वक व्यवहार करता है |
उसका लोभ उपशांत नहीं है,
इसलिए वह स्वार्थ की सिद्धि के लिए दुसरे के स्वार्थों का विघटन करता है |

- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी 

Meditation

Actually there are strong walls between you and Peace & Happiness.
First, Your vision is not transparent,
Second, you don't want to know your inner wealth,
Third, you don't believe in yourself & your inner wealth.
And major problem is you don't have the determination and seriousness to do it
by MEDITATION.

क्या नाश्ता नहीं मिला ?


मुनि नथमल के चेहरे पर सुस्ती और आलस्य देखकर आचार्य कालूगणी ने पूछा -
" क्या नाश्ता नहीं मिला ? "
और साध्वी सोनाजी को नाश्ता लाने का आदेश दिया |
नाश्ता से भी महत्वपूर्ण है - स्नेह और करूणा
कई बार गुरुदेव महाप्रज्ञ जी को पूछते -
" लै, और लैसी के ?" 
एक बार कोई लन्दन से काले अंगूर लाया |
पूज्य कालूगणी ने मुनियों को अंगूर बख्साए |

विनोद के क्षणों में पूज्य कालूगणी श्री महाप्रज्ञ को 
अनेक नाम से बुलाते 
' बंगू, शम्भू, हाबू, वल्कलचीरी, नत्थू ' आदि

उपयोगी कौन नहीं बन सकता ?

आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी का दूसरा प्रिय वाक्य था - 
" निर्मलता के साथ-साथ उपयोगी बनना है | "
जो स्वार्थ में रहेगा,
वह उपयोगी नहीं बन सकेगा |

Do you get enough sleep ?

Aacharya Mahapragyajii  was once asked by another Aacharya -
" Do you get good sleep?"
Gurudev replied "Yes"
Aacharya asked " How can you sleep peacefully, when you have nearly 800 Sadhu-Sadhvis?"
Gurudev replied " Sadhu-Sadhvis are like horses and they are free to roam; 
but their control is in my hand"
Note- Free means CONFIDENCE & control means HUMILITY ( VINAY).

The other Aacharya added that in my sangh i have only 5 Sadhus,
yet so many problems, 
I cannot sleep peacefully.

Sunday, April 15, 2012

शक्ति कहां लगाएं ?

शक्ति कहां लगाएं ?
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सब 'अनंत' शक्ति के भण्डार हैं |
१. कुछ ऐसे हैं, 
जिन्हें अपनी शक्ति का भान नहीं होता |
२. कुछ ऐसे हैं, 
जो आलस्यवश शक्ति का प्रयोग नहीं करते |
३. कुछ ऐसे हैं, 
जो शक्ति का दुरूपयोग करते हैं, 
विरोध या प्रतिकार में | 
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हमारी शक्ति निर्माण में लगे, विरोध में न खप जाय |
- महात्माश्री महाप्रज्ञजी 

बातों का रस और कहाँ !!!

इधर- उधर की बातें करने में जो रस है,
वह एक ग्रन्थ पढ़ने में कहां ?
एक व्यक्ति ५ व्यक्तियों की बात करता है,
बड़ा रस आता है,
वह समझता है 
- " मैं धन्य हो गया |"
एक पुस्तक लेकर बैठने में उसे सार्थकता नहीं लगती |
~ आचार्य महाप्रज्ञजी 

अच्छा शिष्य कैसे बनें ?

आचार्य श्री महाप्रज्ञ का प्रिय सूत्र -
" असीसस्स नत्थी सीसा "
जो अच्छा शिष्य रहा है, वह कभी गुरु बन सकता है और उसके शिष्य बन सकते हैं |
किन्तु जो कभी शिष्य नहीं रहा, जिसने अनुशासन को कभी अंगीकार नहीं किया,
उसमें गुरु बनने की योग्यता या अर्हता कभी नहीं आती |
" नत्थी सीसा असीसस्स " - अशिष्य के कोई शिष्य नहीं होता |

दीक्षा के समय

महात्मा महाप्रज्ञ 
दीक्षा के समय सरदारशहर में सेठ सुमेरमलजी दुगड़ के यहाँ से 
छोटी घोड़ी मंगाई गयी ,क्योंकि नथमल छोटा था 
श्री गणेशदासजी गधैया के परिवार ने इस प्रकार जिम्मा निभाया मानो उनके परिवार के कोई सदस्य दीक्षा ले रहा हो 
दीक्षा के बाद आचार्य कालूगणी ने मुनि नथमल को कहा 
" तुम जाओ, तुलछू ( मुनि तुलसी ) के पास सीखो "

धन है तो सब कुछ है !!!

परिग्रह में डूबा व्यक्ति अध्यात्म का मूल्य नहीं आंक सकता |
उसे मनुष्य जन्म दुर्लभ है ये बोध भी नहीं होता |
मूल्यवान है - धन |
धन पास में है तो सब कुछ है |
जीवन चलाने का साधन धन को माना जा सकता है,
पर उसे सब कुछ नहीं माना जा सकता |
धन को सब कुछ मानने वाले मानसिक और भावात्मक तनाव में रहते हैं |

मन कैसा होता है ?

मनुष्य का मन सरसों की पोटली है,
पोटली की सरसों यदि एक बार बिखर जाए 
तो इकठ्ठा करना मुश्किल हो जाता है |
~ आचार्य महाप्रज्ञजी 

मज़ा कैसे आये ?

विकथा = स्त्री कथा, भक्त कथा ( भोजन सम्बन्धी बातें ), देश कथा, राज कथा आदि-आदि का परिहार नहीं होता,
निंदा, चुगली, पर-परिवाद का परिहार नहीं होता,
तब तक स्वाध्याय में रूचि नहीं हो सकती |
क्योंकि तत्व ज्ञान इतना रुखा है,
जिसके प्रति रस पैदा होना मुश्किल है |
~ आचार्य महाप्रज्ञ

खाली दिमाग ...किसी का है क्या ?

खाली दिमाग शैतान का घर;
शैतानी से भरा हुआ दिमाग शैतान का घर होता है |
क्योंकि व्यक्ति का दिमाग खाली होता ही नहीं |
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खाली दिमाग वह होता है, 
जहां न चिंतन, 
न विचार, 
न कल्पना और 
न ही कोई स्मृति हो |
उसमें केवल अपनी शुद्ध चेतना का अनुभव होता है |
जहां शुद्ध चेतना है, वहां शैतान आ ही नहीं सकता |
- आचार्य महाप्रज्ञ जी

ऐसा शिष्य कहां मिलेगा ? रामकृष्ण को विवेकान्द

गुरुदेव तुलसी - 
विवेकानंद को रामकृष्ण मिले, सचमुच विवेकानंद धन्य हो गए |
पर रामकृष्ण को विवेकान्द जैसा शिष्य मिला, 
यह भी कम गौरव की बात नहीं |
ठीक उसी प्रकार आचार्य महाप्रज्ञ जैसे शिष्य मुझे मिले, 
यह मेरे लिए सात्विक गौरव का विषय है |

मुक्ति का मार्ग कौन सा ?

सारा संसार कष्टों से व्याकुल है,
सहने का मार्ग, मुक्ति का मार्ग है |

चने + चावल = x

महाप्रज्ञ जी ने वि.स. २०१० में चने की बनी वस्तुएँ और चावल की वर्जना कर दी |
स्वास्थ्य की समस्या सुलझती गई |

आहार में सुधार

आचार्य श्री महाप्रज्ञ - आहार परिवर्तन -
" मैंने 
मैदा,
मावा,
तली हुई वस्तुएँ,
मिठाइयां -
इन सबका वर्जन कर दिया |
लगभग ५० वर्ष हो गए |
पाचन-तंत्र में सुधार हुआ |
मस्तिष्क से काम लेना है तो जीभ और पेट की हर मांग को स्वीकार नहीं करना चाहिए | "

संकल्प करे इंसान तो क्या हो नहीं सकता !!!

मनुष्य संकल्प का पुतला होता है,
दृढ संकल्प से असाध्य लगनेवाली वस्तु एक दिन साध्य बन जाति है |
~ आचार्य महाप्रज्ञ

आचार्य श्री का सबसे विवेकपूर्ण निर्णय

महाप्रज्ञ जी को युवाचार्य घोषित करने के बाद जब गुरुदेव तुलसी दिल्ली पहुंचे,
तब अक्षय कुमार जैन ने उनसे कहा -
" आचार्यश्री ! आपने अपने जीवन में अनेक निर्णय लिए है,
इस निर्णय को मैं सबसे अधिक विवेकपूर्ण मानता हूं |"

किस-किस ने महाप्रज्ञजी के दर्शन किये हैं ?

किस-किस ने महाप्रज्ञजी के दर्शन किये हैं ?
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विनोबा भावे,
इंदिरा गांधी,
जयप्रकाश नारायण,
राम मनोहर लोहिया,
डा. राजा रमन्ना,
राजीव गांधी,
जैनेन्द्र कुमार,
कामरेड यशपाल,
डॉक्टर मनमोहन सिंह
हरिवंशराय बच्चन,
साहू शांतिप्रसाद जी,
पी.वी.नरसिम्हा राव,
अटल बिहारी वाजपेयी,
रामनाथ गोयनका,
ए.पी.जे. अब्दुल कलाम
अभिनेता दिलीप कुमार
ने भी गुरुदेव के दर्शन किये हैं |

नोट - सैकड़ों नाम और भी जोड़े जा सकते हैं |

राष्टपति भवन से झोपडी तक

भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद से लेकर 
वर्तमान राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने महाप्रज्ञ जी के दर्शन किये |
प्रथम प्रधानमंत्री श्री नेहरु जी से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने 
गुरुदेव के सानिध्य का लाभ लिया है |
राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री-निवास से लेकर घास-फूस की झोपडी में भी रहना हुआ |

सबसे बड़ा गुण क्या ?

सबसे बड़ा गुण क्या ?
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क्षमा एक गुण है |
विनम्रता एक गुण है |
संतोष एक गुण है |
पर अब मैं कहता हूं कि 
इन तीनों की अपेक्षा ' सरलता ' ज्यादा बड़ा गुण है |
- आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी 

मन लग गया ?

मन लग गया ?
महाप्रज्ञ जी और उनकी मां ने एक ही दिन दीक्षा ग्रहण की थी |
दीक्षा के दुसरे दिन सुबह बाल सुलभ स्वर में मां से कहा -
' मां ! मेरा तो साधुपन में मन लग गया, तुम्हारा भी लग गया ? '
साध्वीप्रमुखा कानकुमारी जी बोली -
' नान्हा साधुजी ! आपका मन लग गया तो इनका भी लग गया | '

सचमुच ' अकिंचन ' कर दिया

जन्म नाम - इंद्रचंद्र, 
फिर परिवर्तित कर के नथमल,
फिर दीक्षा के बाद मुनि नथमल,
फिर विशेषण मुनि नथमल " महाप्रज्ञ ",
फिर केवल " महाप्रज्ञ " |
दीक्षा के बाद सब छूट जाता है, पर नाम रहता है |
गुरुदेव तुलसी ने ' महाप्रज्ञ ' नाम देकर सही अर्थों में ' अकिंचन ' कर दिया |