Monday, April 16, 2012

लगे रहो सत्य की खोज में


वे ही व्यक्ति इस दुनिया में सफल होते हैं
और
वे ही अपना विकास करते हैं,
जो सत्य को खोजते रहते हैं |
जो यह मानकर बैठ जाते है
कि जो मैं जानता हूं,
वही सत्य है
या
जो पहले खोज लिया गया,
वही सत्य है,
इससे आगे और कुछ नहीं है,
वे जहां के तहां रह जाते हैं,
अपना विकास नहीं कर सकते |
सत्य की खोज में जहां लक्ष्मणरेखा खींच ली जाती है,
वहां कोई विकास नहीं हो सकता |
हमें विकास की प्रक्रिया को समझना है |
कुछ लोग रुढिवादी होते हैं |
रुढिवादी शब्द कुछ कड़ा है,
उन्हें अच्छा नहीं लगता,
इसलिए वे सिद्धांतवादी कहलाना पसंद करते हैं |
यह शब्द थोडा मुलायम और सम्मानजनक है |
ऐसे सिद्धांतवादी लोग सत्य के ठेकेदार बन जाते हैं |
वे नहीं जानते कि बुद्धि की भी सीमा है |
तुम्हारी बुद्धि में जितना समाया,
उतना तुम् जानते हो,
लेकिन सबकुछ जानने का दावा कैसे कर सकते हो ?
गागर में समुद्र कैसे समा सकता है ?
हमारा मन-मस्तिष्क एक गागर जितना ही तो है |
उसमें समस्त सारा ज्ञान कैसे समाहित हो सकता है ?
मैं सब कुछ जानता हूं,
यह समझकर बैठ जाना विकास को विराम लगा देने जैसा है |

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