Wednesday, December 30, 2015

स्वाध्याय/बातें

स्वाध्याय/बातें
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आचार्यवर (संतों से) - स्वाध्याय जीवन का सार-तत्त्व है |
जो जितना स्वाध्याय करेगा,
उसका जीवन विकासोन्मुखी बनेगा |
इसलिए स्वाध्याय में मन लगाना चाहिए |
प्रोफ़ेसर मुनिश्री महेंद्रकुमारजी -
भंते ! बातों की अपेक्षा स्वाध्याय में मन कम लगता है,
इसका क्या कारण है ?
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आचार्यवर - जीवन रूचि के आधार पर चलता है |
रूचि और वातावरण आकर्षण पैदा करता है |
जिसको अपने हित और अहित का ज्ञान होता है,
उनका मन स्वाध्याय में अधिक लगेगा और
जिसमें इस ज्ञान का अभाव है,
उन्हें केवल वार्तालाप का वातावरण मिलने से बाह्य आकर्षण लुभाता है,
बातें अच्छी लगती हैं |

आवेश !

धर्म को निष्प्राण करने वाला कोई तत्व
अगर मुख्य रूप से जिम्मेदार है
तो वह है आवेश।
कहीं लोभ का आवेश,
कहीं क्रोध का आवेश,
कहीं अहंकार का आवेश और
कहीं पद-प्रतिष्ठा का आवेश।
-  आचार्यश्री महाप्रज्ञश्री  

Friday, December 25, 2015

मैं महाप्रज्ञ के साहित्य का प्रेमी पाठक हूँ - वाजपेयी

मैं महाप्रज्ञ के साहित्य का प्रेमी पाठक हूँ -
अटल विहारी वाजपेयी
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१३ मई १९९४ !
अक्षय तृतीया का पावन पर्व !!
विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए
श्री वाजपेयी ने कहा -
मैं महाप्रज्ञ के साहित्य का प्रेमी पाठक हूँ |
अपने भाषणों में इनकी कथाओं,
दृष्टान्तों और मौलिक विचारों का बहुत उपयोग करता रहा हूँ |