स्वाध्याय/बातें
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आचार्यवर (संतों से) - स्वाध्याय जीवन का सार-तत्त्व है |
जो जितना स्वाध्याय करेगा,
उसका जीवन विकासोन्मुखी बनेगा |
इसलिए स्वाध्याय में मन लगाना चाहिए |
प्रोफ़ेसर मुनिश्री महेंद्रकुमारजी -
भंते ! बातों की अपेक्षा स्वाध्याय में मन कम लगता है,
इसका क्या कारण है ?
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आचार्यवर - जीवन रूचि के आधार पर चलता है |
रूचि और वातावरण आकर्षण पैदा करता है |
जिसको अपने हित और अहित का ज्ञान होता है,
उनका मन स्वाध्याय में अधिक लगेगा और
जिसमें इस ज्ञान का अभाव है,
उन्हें केवल वार्तालाप का वातावरण मिलने से बाह्य आकर्षण लुभाता है,
बातें अच्छी लगती हैं |
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आचार्यवर (संतों से) - स्वाध्याय जीवन का सार-तत्त्व है |
जो जितना स्वाध्याय करेगा,
उसका जीवन विकासोन्मुखी बनेगा |
इसलिए स्वाध्याय में मन लगाना चाहिए |
प्रोफ़ेसर मुनिश्री महेंद्रकुमारजी -
भंते ! बातों की अपेक्षा स्वाध्याय में मन कम लगता है,
इसका क्या कारण है ?
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आचार्यवर - जीवन रूचि के आधार पर चलता है |
रूचि और वातावरण आकर्षण पैदा करता है |
जिसको अपने हित और अहित का ज्ञान होता है,
उनका मन स्वाध्याय में अधिक लगेगा और
जिसमें इस ज्ञान का अभाव है,
उन्हें केवल वार्तालाप का वातावरण मिलने से बाह्य आकर्षण लुभाता है,
बातें अच्छी लगती हैं |
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