मुनि नथमल के चेहरे पर सुस्ती और आलस्य देखकर आचार्य कालूगणी ने पूछा -
" क्या नाश्ता नहीं मिला ? "
और साध्वी सोनाजी को नाश्ता लाने का आदेश दिया |
नाश्ता से भी महत्वपूर्ण है - स्नेह और करूणा
कई बार गुरुदेव महाप्रज्ञ जी को पूछते -
" लै, और लैसी के ?"
एक बार कोई लन्दन से काले अंगूर लाया |
पूज्य कालूगणी ने मुनियों को अंगूर बख्साए |
विनोद के क्षणों में पूज्य कालूगणी श्री महाप्रज्ञ को
अनेक नाम से बुलाते
' बंगू, शम्भू, हाबू, वल्कलचीरी, नत्थू ' आदि
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