Sunday, April 15, 2012

बातों का रस और कहाँ !!!

इधर- उधर की बातें करने में जो रस है,
वह एक ग्रन्थ पढ़ने में कहां ?
एक व्यक्ति ५ व्यक्तियों की बात करता है,
बड़ा रस आता है,
वह समझता है 
- " मैं धन्य हो गया |"
एक पुस्तक लेकर बैठने में उसे सार्थकता नहीं लगती |
~ आचार्य महाप्रज्ञजी 

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