Thursday, July 11, 2013

अब दर्शन नहीं...


अब दर्शन नहीं ....
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मैं उस सौभाग्यशाली परिवार का सदस्य हूं
जहां गणाधिपति तुलसी ने अंतिम एकांतवास किया,
हमारे परिवार को सेवा का अवसर दिया |
पीढ़ियों से ही पुरे परिवार में ' गुरु-दर्शन-सेवा '
के संस्कार गहरे जमे हुए हैं |
चार पीढ़ियों से अनवरत यह क्रम चल रहा है |
सामूहिक रूप से भी और जब, जैसे, जिसको
अवसर मिल जाए,
दर्शन-सेवा का सौभाग्य हर सदस्य हासिल कर ही लेता है |
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उसी क्रम से दिल्ली से बीकानेर की ओर जाते हुए
भादासर में २२ अप्रैल २०१० को पूज्य गुरुदेव
( आचार्य महाप्रज्ञजी ) की उपासना में पहुंचा |
सेवा, उपासना का अच्छा लाभ मिला |
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जाते समय मंगल पाठ सुनने से पूर्व मैंने
निवेदन किया -
" वापस जल्दी दर्शन करूंगा |"
पता नहीं क्यों ?
गुरुदेव ने तत्काल फ़रमाया -
" अब दर्शन नहीं....|"
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मेरे मन में आया --
गुरुदेव ने ऐसा क्यों फरमाया ?
मैं हार्ट का पेशेंट हूं |
कहीं मेरी भावी की ओर इंगित करते हुए ही तो
पूज्यवर ने ऐसा नहीं फरमाया है |
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कभी भी, कुछ भी हो जाए
तो सावधान हो जाना चाहिए |
फलतः बीकानेर घर जाकर पत्नी को बता दिया -
गुरुदेव ने ऐसा फरमाया है -
मेरे कभी कुछ हो जाए,
कोई घटना घटित हो जाए
तो बच्चों का ध्यान रखना |
सबको पूरी तरह सम्भालवन दे दी |
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पर उन शब्दों का अर्थ ९ मई २०१० अचानक दूसरा ही दे गई |
अब मन में आता है
काश ! गुरुदेव से ही उस कथन का कारण पूछ पाता,
रहस्य को ग्रहण कर पाता |
पर अब तो ये बात बात ही रह गई |
श्रद्धासिक्त भावों से प्रणाम ही कर सकता हूं |
- सुरेन्द्र बोथरा, बीकानेर

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