धन से भी धर्म होता नहीं
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धर्म के साधन दो ही हैं -
संवर और निर्ज़रा या त्याग और तपस्या |
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यदि धन के द्वारा धर्म होता तो महावीर की धर्मदेशना विफल नहीं होती |
भगवान को वैशाख शुक्ला १० को केवलज्ञान उत्पन्न हुआ |
सभा में केवल देवताओं की उपस्थिति थी,
मनुष्य कोई नहीं था |
भगवान ने धर्मदेशना दी |
देवताओं ने धर्म अंगीकार नहीं किया |
कोई साधू या श्रावक नहीं बना |
इसलिए माना जाता है कि
भगवान की पहली देशना विफल हुई |
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यदि धन से धर्म होता तो देवता भी धर्म कर लेते |
देवताओं से व्रत का आचरण होता नहीं
और धन से भी धर्म होता नहीं |
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भगवान की वाणी तब सफल हुई,
जब मनुष्यों ने व्रत ग्रहण किया, साधू और श्रावक बने |
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कोई समर्थ व्यक्ति किसी दरिद्र को धन देकर सुखी बना देता है,
वह सांसारिक उपकार है |
सांसारिक उपकार से संसार की परंपरा चलती है
और आध्यात्मिक उपकार से संसार का अंत होता है
अर्थात मुक्ति होती है |
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कोई लाखों रुपये देकर मरते हुए जीवों को छुड़ाता है,
यह संसार का उपकार है |
इससे आत्ममुक्ति नहीं होती |
( कोई जीव छुड़ावे लाखां दाम दे, ते तो आपरो सीखायो नहीं धर्म हो |
ओ तो उपगार संसार नो, तिणसुं कटता न जाण्या आप कर्म हो ||
~ आचार्य भिक्षु द्वारा रचित दोहा )
- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी
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धर्म के साधन दो ही हैं -
संवर और निर्ज़रा या त्याग और तपस्या |
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यदि धन के द्वारा धर्म होता तो महावीर की धर्मदेशना विफल नहीं होती |
भगवान को वैशाख शुक्ला १० को केवलज्ञान उत्पन्न हुआ |
सभा में केवल देवताओं की उपस्थिति थी,
मनुष्य कोई नहीं था |
भगवान ने धर्मदेशना दी |
देवताओं ने धर्म अंगीकार नहीं किया |
कोई साधू या श्रावक नहीं बना |
इसलिए माना जाता है कि
भगवान की पहली देशना विफल हुई |
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यदि धन से धर्म होता तो देवता भी धर्म कर लेते |
देवताओं से व्रत का आचरण होता नहीं
और धन से भी धर्म होता नहीं |
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भगवान की वाणी तब सफल हुई,
जब मनुष्यों ने व्रत ग्रहण किया, साधू और श्रावक बने |
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कोई समर्थ व्यक्ति किसी दरिद्र को धन देकर सुखी बना देता है,
वह सांसारिक उपकार है |
सांसारिक उपकार से संसार की परंपरा चलती है
और आध्यात्मिक उपकार से संसार का अंत होता है
अर्थात मुक्ति होती है |
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कोई लाखों रुपये देकर मरते हुए जीवों को छुड़ाता है,
यह संसार का उपकार है |
इससे आत्ममुक्ति नहीं होती |
( कोई जीव छुड़ावे लाखां दाम दे, ते तो आपरो सीखायो नहीं धर्म हो |
ओ तो उपगार संसार नो, तिणसुं कटता न जाण्या आप कर्म हो ||
~ आचार्य भिक्षु द्वारा रचित दोहा )
- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी
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