Thursday, July 11, 2013

मन चंगा तो कठौती में गंगा


मन चंगा तो कठौती में गंगा !!!
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संत रैदास जाति के चर्मकार थे |
गृहस्थ जीवन में भी वे संत का-सा जीवन जीते थे |
पेशा था जुते-चप्पल बनाना और उन्हें ठीक करना |
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एक बार कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा-स्नान का पर्व आया |
लोग बड़ी संख्या में गंगाघाट की ओर जा रहे थे |
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लेकिन रैदासजी की तो दुनिया ही अलग थी |
वे अपने काम में रमे रहते और
मधुर स्वर में भजन गाया करते |
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एक बहिन रैदास के पास अपनी चप्पल ठीक कराने आई तो पूछा -
" सब गंगा स्नान करने जा रहे हैं भगतजी !
मैं भी जा रही हूं | आप नहीं जाओगे क्या ?
संत रैदास ने जूतों के ढेर की ओर इंगित कर कहा -
" यह देखो, इतना सारा काम ले रखा है |
समय पर सबको देना है मैं तो यहीं अपना काम करता-करता गंगा मां
के भाव-दर्शन कर लूंगा |"
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वह बहिन गंगा स्नान करके लौटी तो
रैदास भक्त से फिर मिलने आई |
मन से काफी निराश थी |
रैदास ने भजन पूरा कर उससे निराशा का कारण पूछा तो बोली -
" गंगा की धारा में डुबकी लगा रही थी |
न जाने कैसे हाथ का कंगन पानी में ही छूट गया |
गई थी धर्म लाभ कमाने |
सोने के कंगन गंवा कर आई हूं |
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मन और भावों से बहुत साफ़ थी वह बहिन |
लेकिन स्वर्णाभूषण खो जाने का गम गहरा था |
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रैदास ने उसके दुःख को देखा |
फिर अपना हाथ पास में रखी कठौती
( चमड़ा भिगोने के लिए पानी से भरा पात्र )
में डाला और
सोने के दो कंगन निकाल कर बोले -
" देखो, कहीं यह तो नहीं ?
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बहिन की आंखें खुशी से चमक उठी |
वह बोली -- हां, भगतजी !
यही हैं मेरे कंगन,
लेकिन ये तो बहती गंगा में गिरे थे....
यहां आपकी कठौती में कैसे ....?
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रैदास ने कहा -
" मन है चंगा तो कठौती में गंगा !!!
मन को चंगा रखो तो जहां हो,
वहीँ तीर्थस्थान का लाभ मिल जाएगा |"
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तभी से यह कहावत चल पड़ी |
- आचार्य श्री महाप्रज्ञजी

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