Thursday, July 11, 2013

कर्म बड़ा बलवान ???

" हम क्या करें ? कर्म में ऐसा ही लिखा था |"
" सब कुछ कर्म ही करता है |"
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इस मिथ्या धारणा ने अनेक भ्रांतियां पैदा की है |
इस धारणा ने 
गरीबी,
बीमारी,
दुर्व्यवस्था
और
अज्ञान को बढाने में सहारा दिया है |
कर्मवाद व्यापक सिद्धांत है |
कालवाद,
स्वभाववाद,
और
नियतिवाद --
ये इतने व्यापक नहीं है,
जितना व्यापक है
" कर्मवाद "

इससे आदमी के पुरुषार्थ का दीप बुझ जाता है |
वह जाने-अनजाने इस अन्धकार में भटक जाता है |
वह मानने लग जाता है कि
मैं असहाय हूं |
मैं कुछ नहीं कर सकता |
जैसा पहले का कर्म-फल है,
वैसा ही मुझे प्राप्त होता रहेगा |
व्यक्ति के मन में यह संस्कार सहज रूप में जम जाता है
कि मैं कुछ भी नहीं हूं |
सब कुछ करनेवाला है कर्म |

मनुष्य में कुछ विशेषताएं होती हैं |
उसमें कुछ विशेष गुण हैं |
ज्ञान,
दर्शन,
चारित्र,
शक्ति,
क्षमता,
कर्तृत्व ---
ये उसके गुण हैं |

बहुत बार ऐसा होता है कि
सही बात को गलत समझ लिया जाता है
और
गलत बात को सही समझ लिया जाता है |
भ्रांतियां अनेक स्थानों पर हो सकती है ---
सुनने में भ्रान्ति,
समझने में भ्रान्ति,
व्याख्या करने वाले में भ्रान्ति |
इन भ्रांतियों के कारण सही बात भी गलत बन जाती है |
और
गलत बात भी सही बन जाती है |

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