विनय > विवेक >विदया
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लाडनूं, १९८९
साध्वी इन्द्रूजी का संथारा चल रहा था |
आचार्य श्री तुलसी महाप्रज्ञ जी के साथ उन्हें दर्शन देने गए |
वहां अनेक साधू-साध्वियां भी उपस्थित थे |
महाप्रज्ञ जी ने साध्वी इन्द्रूजी से कहा -
देखो, इतने साधू-साध्वियां यहाँ उपस्थित हैं |
इन्हें कुछ कहना हो तो बोलो |
साध्वीजी ने ३ शब्दों का उच्चारण किया -
१. विनय,
२. विवेक और
३. विद्या |
युवाचार्य जी महाप्रज्ञजी ने इस वाक्य का रहस्य प्रकट करते हुए कहा -
" साध्वी इन्द्रूजी ने विद्या को तीसरा स्थान दिया है |
इसका तात्पर्य यह है कि
सबसे पहले विनय होना चाहिए |
विनय से विवेक आता है |
विनय और विवेक से शून्य विद्या का कोई मूल्य नहीं होता |"
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लाडनूं, १९८९
साध्वी इन्द्रूजी का संथारा चल रहा था |
आचार्य श्री तुलसी महाप्रज्ञ जी के साथ उन्हें दर्शन देने गए |
वहां अनेक साधू-साध्वियां भी उपस्थित थे |
महाप्रज्ञ जी ने साध्वी इन्द्रूजी से कहा -
देखो, इतने साधू-साध्वियां यहाँ उपस्थित हैं |
इन्हें कुछ कहना हो तो बोलो |
साध्वीजी ने ३ शब्दों का उच्चारण किया -
१. विनय,
२. विवेक और
३. विद्या |
युवाचार्य जी महाप्रज्ञजी ने इस वाक्य का रहस्य प्रकट करते हुए कहा -
" साध्वी इन्द्रूजी ने विद्या को तीसरा स्थान दिया है |
इसका तात्पर्य यह है कि
सबसे पहले विनय होना चाहिए |
विनय से विवेक आता है |
विनय और विवेक से शून्य विद्या का कोई मूल्य नहीं होता |"
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