Thursday, July 11, 2013

बुद्धिमान को इस दुनिया में पैदा ही नहीं करता

बुद्धिमान को इस दुनिया में पैदा ही नहीं करता - १ 
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मैंने ३०-४० वर्ष पहले एक कविता लिखी थी |
" मेरे प्रभु !
मैं भगवान होता तो बुद्धिमान को इस दुनिया में पैदा ही नहीं करता |"
बात किसी को अटपटी लग सकती है, 
किन्तु यह एक सचाई है कि बहुत सारी समस्याएं बुद्धिमान लोग पैदा करते हैं |
बुद्धि के साथ भावात्मक विकास की बात और जुड़नी चाहिए |
इससे चरित्र का निर्माण होगा |
कोरी बुद्धि एक समस्या को सुलझाती है
और
दूसरी नई समस्या पैदा कर देती है |
एलोपैथी दवा का सेवन करने पर भी ऐसा ही होता है |
उसका रिएक्शन भी होता है |
औषधि वह जो रोग को मिटाए
और नया रोग पैदा न करे | 

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भावात्मक विकास होगा आत्मज्ञान से |
भावों के साथ आत्मा का सम्बन्ध निकट का है,
बुद्धि का सम्बन्ध दूर का है |
परिवार और समाज -
की बहुत सारी समस्याएं भावों पर अनियंत्रण के कारण हो रही है |
असहिष्णुता बढ रही है |
मन के प्रतिकूल कोई बात आदमी बर्दाश्त नहीं कर पाता |
तत्वज्ञान हो तो सहनशक्ति का विकास हो सकता है | 

दूसरा स्तर है -
" मानस ज्ञान "
जो इन्द्रियों द्वारा प्रदत्त है,
इन्द्रियों के द्वारा मिला है,
उनका मन के साथ विश्लेषण करते हैं |
तीसरा स्तर है - 
" बौद्धिक ज्ञान "
इसके द्वारा हम निर्णय करते हैं,
चिंतन करते हैं |
एक तरह से बुद्धि का व्यवसाय होता है |
चेतना का चौथा स्तर है -
" भाव "
यह बुद्धि से आगे की बात है |
इन्द्रियों से परे मन है,
मन से परे बुद्धि है
और जो बुद्धि से परे है,
वह है परम सत्य | 

बुद्धि परम सत्य तक नहीं पहुंचती |
परम सत्य तक पहुंचाता है -
" आत्मज्ञान "
इसे हम प्रज्ञा कह सकते हैं |
प्रज्ञा से अतीन्द्रिय ज्ञान का प्रारम्भ होता है |
सब कुछ इन्द्रिय ज्ञान की सीमा में है,
यह समझना भूल है |
इन्द्रियों से आगे है -
अतीन्द्रिय चेतना |
इसमें न इन्द्रियों की जरूरत है,
न मन की जरूरत,
न बुद्धि की जरूरत |
यहां तो अपने भीतर से ही ज्ञान प्रकट होता है | 

हमारे भीतर कितना ज्ञान है,
इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है |
लेकिन जब तक उस ज्ञान का स्रोत नहीं खुलता,
पूरी क्षमता प्रकट नहीं हो सकती |
वह स्रोत खुलता है -
साधना के द्वारा |
पढ़ाई से जानकारी बढ सकती है,
ज्ञान नहीं बढ सकता | 

एक होता है मूर्खता को मिटानेवाला ज्ञान 
और 
दूसरा होता है मूढता को मिटाने वाला ज्ञान |
मूर्खता और मूढता दोनों अलग बातें हैं |
जो नासमझ है, उसे मूर्ख कहते हैं |
जो सब कुछ जानते हुए भी गलत काम करता है,
वह है मूढ़ |
विद्यालय और कॉलेज मूर्खता को मिटा सकते हैं,
किन्तु मूढता को मिटाने का काम तो धार्मिक ही कर सकता है |
धार्मिक भी वही, जो धर्म के मर्म को समझता है |कोई भी बड़ी बुराई अनजाने में नहीं होती |
छोटी बुराई तो आदमी अनजान या भूलवश कर लेता है,
किन्तु बड़ी बुराई जानबूझकर की जाती है |
ऐसा मोह के दबाव के कारण होता है |

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