आत्मदर्शन
-----------
आत्मा के द्वारा आत्मा को देखो |
यह आत्मदर्शन का एक संकेत है |
चैतन्य जगत में आत्मा एक है |
वह कषाय ( क्रोध, मान, माया, लोभ ) से परिवृत्त भी है |
उसके अनेक रूप बन जाते हैं |
--------
देखने वाली है --
चैतन्य स्वरुप आत्मा और
उसके नाना रूप दृश्य बनते हैं |
आत्मदर्शन -
मैं कौन हूं मैं कहां हूं
---------- -------------------
* वासना पुरुष काम केंद्र की चेतना सक्रिय
* इच्छा पुरुष नाभि की चेतना सक्रिय
* आनंद पुरुष ह्रदय की चेतना सक्रिय
* प्राण पुरुष नासाग्र की चेतना सक्रिय
* प्रज्ञा पुरुष दर्शन केंद्र की चेतना सक्रिय
-----------
आत्मा के द्वारा आत्मा को देखो |
यह आत्मदर्शन का एक संकेत है |
चैतन्य जगत में आत्मा एक है |
वह कषाय ( क्रोध, मान, माया, लोभ ) से परिवृत्त भी है |
उसके अनेक रूप बन जाते हैं |
--------
देखने वाली है --
चैतन्य स्वरुप आत्मा और
उसके नाना रूप दृश्य बनते हैं |
आत्मदर्शन -
मैं कौन हूं मैं कहां हूं
---------- -------------------
* वासना पुरुष काम केंद्र की चेतना सक्रिय
* इच्छा पुरुष नाभि की चेतना सक्रिय
* आनंद पुरुष ह्रदय की चेतना सक्रिय
* प्राण पुरुष नासाग्र की चेतना सक्रिय
* प्रज्ञा पुरुष दर्शन केंद्र की चेतना सक्रिय
No comments:
Post a Comment