Thursday, July 11, 2013

चतुरंग कायोत्सर्ग

चतुरंग कायोत्सर्ग
-----------------
कायोत्सर्ग का शाब्दिक अर्थ है -
काया का उत्सर्ग करना |
बोलना, सोचना ये सब शरीर से जुड़े हुए हैं |
इसलिए कायोत्सर्ग वाचिक और मानसिक भी होता है |
इस आधार पर चतुरंग कायोत्सर्ग की व्यवस्था की गई है :-
१. शारीरिक - शिथिलीकरण |
२. वाचिक - स्वरयंत्र का शिथिलीकरण, कंठ का कायोत्सर्ग | 
३. मानसिक - विचारप्रेक्षा |
४. भावात्मक - ममत्वविसर्जन ' मैं शरीर नहीं हूँ ' इस भेदविज्ञान का अभ्यास |
==========
कायोत्सर्ग की पांच भूमिकाएं
-----------------------------
कायोत्सर्ग के लिए दीर्घकालीन अभ्यास जरुरी है |
अभ्यास की कालावधि के आधार पर कायोत्सर्ग
की पांच भूमिकाएं बनती हैं :-
१. सुझाव (Auto-suggestion) - पूर्ण एकाग्रता के साथ सुझाव देना |
२. प्राणशक्ति के प्रकाम्पनों का अनुभव और प्राणशक्ति के प्रवाह का अनुभव |
३. शरीर और प्राणप्रवाह के भेद का अनुभव |
४. कर्म शरीर के प्रकम्पनों का अनुभव
५. शुद्ध चैतन्य का अनुभव |

No comments:

Post a Comment