Thursday, July 11, 2013

आलोचना


जहां हिंसा है, वहां धर्म नहीं है -
भगवान् महावीर की वाणी का यह शाश्वत विचार है |
गृहस्थ नाना प्रकार के आरम्भ-समारंभ करता है,
पर उसे धर्म समझना उचित नहीं है |
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यदि मोह, राग या अव्रतसेवन की प्रवृत्ति को धर्म माना जाए
तो उससे हमारा दृष्टिकोण अशुद्ध हो जाता है |
यदि मोह राग की प्रवृत्ति तथा असंयम का आचरण करने-कराने को
धर्म समझा हो तो उसकी आलोचना कर लेनी चाहिए |
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इससे सम्यक्त्व और चारित्र दोनों ही दूषित होते हैं तथा
पाप कर्मों का बंधन होता है |
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श्रावक के व्यावहारिक जीवन में मैत्री व प्रमोद भावना का संस्कार होना चाहिए |
ईर्ष्या की वृत्ति से मनुष्य की विवेक चेतना लुप्त हो जाती है |
इस स्थिति में उसका चिंतन बिलकुल नकारात्मक हो जाता है |
वह दूसरों की प्रगति को सहन नहीं कर सकता |
उन पर मिथ्या आरोप लगाकर उनके विकास में बाधक बनने का प्रयास करता है |
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इससे सम्यक्त्व और चारित्र दोनों ही दूषित होते हैं तथा
पाप कर्मों का बंधन होता है |
१२ व्रतों की सही आराधना के लिए इस प्रकार के पापों की आलोचना करना जरुरी है |
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यदि गुणवान मनुष्यों के प्रति ईर्ष्या की भावना जाग्रत हुई हो,
उन पर दोषारोपण किया हो तथा
ईर्ष्या और मात्सर्य से ग्रसित होकर मैंने निंदा की हो
तो मैं उसका " मिच्छामि दुक्कड़म् " करता हूं |

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