छज्जे पर कबूतर बैठे थे |
सूर्यास्त हो चूका था |
अँधेरे ने अपने पांव फैला दिये |
आचार्य श्री महाप्रज्ञजी का कवि-मानस बोल उठा -
" पहले क्षण में अनंत आकाश में उड़नेवाले ये कबूतर
दुसरे क्षण में घरों के छज्जों पर आ बैठते हैं |
दिन और रात में कितना अंतर होता है -
इसे कबूतर ही जान सकते हैं,
दुसरे नहीं |
सूर्यास्त हो चूका था |
अँधेरे ने अपने पांव फैला दिये |
आचार्य श्री महाप्रज्ञजी का कवि-मानस बोल उठा -
" पहले क्षण में अनंत आकाश में उड़नेवाले ये कबूतर
दुसरे क्षण में घरों के छज्जों पर आ बैठते हैं |
दिन और रात में कितना अंतर होता है -
इसे कबूतर ही जान सकते हैं,
दुसरे नहीं |
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