Friday, April 30, 2021

भगवान महावीर का वैराग्य

 साधना के लिए एकांतवास और मौन

- ये आवश्यक हैं |
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जो पहले अपने को न साधे,
वह दूसरों का हित नहीं साध सकता |
स्वयं अपूर्ण पूर्णता का मार्ग नहीं दिखा सकता |
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कई आदमी भगवान् का अभिवादन करते,
फिर भी वे उनसे नहीं बोलते |
कई आदमी भगवान् को मारते-पीटते;
किन्तु उन्हें भी वे कुछ नहीं कहते |
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भगवान् वैसी कठोरचर्या में रम रहे थे,
जो सबके लिए सुलभ नहीं है |
- आचार्य श्री महाप्रज्ञजी के
" जैन धर्म : मनन और मीमांसा पृष्ठ संख्या - २० " से
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सहज आनंद और आत्मिक चैतन्य जागृत नहीं होता,
तब तक बाहरी उपकरणों के द्वारा आमोद पाने की चेष्टा होती है |
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जिनके चैतन्य का पर्दा खुल जाता है,
सहज सुख का स्रोत फूट पड़ता है
- वे नीरस होते ही नहीं,
वे सदा समरस रहते हैं |
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बाहरी साधनों के द्वारा अंतर के नीरस भाव को
सरस बनाने का यत्न करने वाले
भले ही उसका मूल्य न आंक सकें |
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भगवान स्त्री-कथा, भक्त-कथा,
देश-कथा और राज-कथा में भाग नहीं लेते |
उन्हें मध्यस्थ भाव से टाल देते |
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भगवान ने विजातीय तत्त्वों (पुदगल-आसक्ति) को
न शरण दी और न उनकी शरण ली |
वे निरपेक्ष भाव से जीते रहे |
- आचार्य श्री महाप्रज्ञजी के
" जैन धर्म : मनन और मीमांसा पृष्ठ संख्या - २० " से
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अपेक्षा का अर्थ है - दुर्बलता |
व्यक्ति का सबल और दुर्बल होने का
मापदण्ड (criteria)अपेक्षाओं की न्यूनाधिकता है |
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भगवान् श्रमण बनने से दो वर्ष
पहले ही अपेक्षाओं को ठुकराने लगे |
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सजीव पानी पीना छोड़ दिया;
अपना अकेलापन देखने लग गए |
क्रोध, मान, माया और लोभ की ज्वाला को शांत कर डाला |
सम्यग् दर्शन का रूप निखर उठा |
पौदगलिक आस्थाएं हिल गईं |
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भगवान् ने मिट्टी, पानी, अग्नि, वायु, वनस्पति और
चर जीवों का अस्तित्व जाना |
उन्हें सजीव मान वे उनकी हिंसा से विलग हो गए |
- आचार्य श्री महाप्रज्ञजी के
" जैन धर्म : मनन और मीमांसा पृष्ठ संख्या - २० " से
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भगवान् का दृष्टि-संयम अनुत्तर था |
वे चलते समय इधर-उधर नहीं देखते,
पीछे नहीं देखते,
बुलाने पर भी नहीं बोलते,
सिर्फ मार्ग को देखते हुए चलते |
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