धर्म नाम या रूप में नहीं होता - १
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अगर कोई महावीर की आत्मा को छूने का प्रयत्न करे,
कोई
राम
और
कृष्ण की आत्मा का स्पर्श करे,
बुद्ध की आत्मा को छूने का प्रयत्न करे,
कोई
ईसा
और
मुहम्मद साहब
की आत्मा का स्पर्श करे,
गुरु नानक की आत्मा का स्पर्श करे
या
जितने भी महापुरुष हुए हैं,
वहां कोई विवाद नहीं है,
कोई झगड़ा नहीं है |
सारा विवाद और संघुर्ष वेशभूषा में अटक गया |
नाम और रूप में अटक गया |
नाम-रूप से ऊपर उठे बिना समस्या का समाधान नहीं होता |
- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी
==========================
धर्म नाम या रूप में नहीं होता - २
एक संत किसी घर आये |
मकान मालिक ने स्वागत किया |
अनुरोध किया - " दूध लेने की कृपा करें |"
संत के हां भरने पर गृहस्वामी ने नौकर को दूध लाने का आदेश दिया |
नौकर गया
और
तुरंत लौटा और बोला -
" मालिक ! कौन सी गाय का दूध लाऊं,
काली गाय
या
सफ़ेद गाय का ?
दूध गौण बन गया,
काली और सफ़ेद गाय मुख्य हो गयी |
मालिक बोला -
" किसी की भी ला ! किन्तु जल्दी ला |"
आखिर मन तो चंचल ही है |
नौकर फिर लौटा और बोला -
" मालिक ! नई व्याई हुई गाय का लाऊँ
या
पुरानी गाय का लाऊं ?
==============
आदमी उलझा है -
नाम-रूप में,
नई-पुरानी में,
सफ़ेद और काली में |
मन में इतने विकल्प हैं कि
उनका कोई अंत नहीं है |
- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी
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अगर कोई महावीर की आत्मा को छूने का प्रयत्न करे,
कोई
राम
और
कृष्ण की आत्मा का स्पर्श करे,
बुद्ध की आत्मा को छूने का प्रयत्न करे,
कोई
ईसा
और
मुहम्मद साहब
की आत्मा का स्पर्श करे,
गुरु नानक की आत्मा का स्पर्श करे
या
जितने भी महापुरुष हुए हैं,
वहां कोई विवाद नहीं है,
कोई झगड़ा नहीं है |
सारा विवाद और संघुर्ष वेशभूषा में अटक गया |
नाम और रूप में अटक गया |
नाम-रूप से ऊपर उठे बिना समस्या का समाधान नहीं होता |
- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी
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धर्म नाम या रूप में नहीं होता - २
एक संत किसी घर आये |
मकान मालिक ने स्वागत किया |
अनुरोध किया - " दूध लेने की कृपा करें |"
संत के हां भरने पर गृहस्वामी ने नौकर को दूध लाने का आदेश दिया |
नौकर गया
और
तुरंत लौटा और बोला -
" मालिक ! कौन सी गाय का दूध लाऊं,
काली गाय
या
सफ़ेद गाय का ?
दूध गौण बन गया,
काली और सफ़ेद गाय मुख्य हो गयी |
मालिक बोला -
" किसी की भी ला ! किन्तु जल्दी ला |"
आखिर मन तो चंचल ही है |
नौकर फिर लौटा और बोला -
" मालिक ! नई व्याई हुई गाय का लाऊँ
या
पुरानी गाय का लाऊं ?
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आदमी उलझा है -
नाम-रूप में,
नई-पुरानी में,
सफ़ेद और काली में |
मन में इतने विकल्प हैं कि
उनका कोई अंत नहीं है |
- आचार्यश्री महाप्रज्ञजी
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