२ महापुरुषों की महान बातें -
२५-०१-२००७ !
गंगाशहर !!
सेवा का प्रसंग चल रहा था |
युवाचार्य श्री महाश्रमणजी ने निवेदन किया -
" आचार्यप्रवर ! मैं आपसे करबद्ध प्रार्थना करता हूं कि
जैसे सब साधू-साध्वियों को सेवा का अवसर मिलता है
वैसे ही मुझे भी मिलना चाहिए |
अभी मैं अवस्था से युवा हूं,
सेवा करने में सक्षम हूं |
अवस्था आने के बाद पता नहीं क्या स्थिति रहे
किन्तु आज तो मैं आपकी कृपा से पूरी तरह फिट हूं |"
आचार्य श्री महाप्रज्ञजी -
" साधू-साध्वियों के लिए तो मात्र त्रैवार्षिक सेवा अनिवार्य है
परन्तु तुम्हारे ऊपर तो आजीवन संघसेवा का दायित्व है |"
युवाचार्य श्री महाश्रमणजी -
" पुज्यप्रवर ! मेरा निवेदन मात्र औपचारिक नहीं है |
मैंने आपश्री से कई बार निवेदन किया था कि
आप मैं आपके साथ यात्रा करता हूं,
आपके साधन के साथ चलता हूं,
लेकिन इस साथ चलने को मैं बहुत सार्थक नहीं मानता |
मैं सार्थक तब मानूंगा
जब साधन चलाने में मेरा भी उपयोग किया जाएगा |"
आचार्य श्री महाप्रज्ञजी -
" महाश्रमण ने कई बार साधन चलाने की कोशिश की
परन्तु जैसे ही ये साधन चलाने का प्रयत्न करते हैं,
सब साधू साधन छोड़कर दूर खड़े हो जाते है |"
युवाचार्य श्री महाश्रमणजी -
" सचमुच, संतों की ओर से यह एक बड़ी बाधा है |
मैं बहुत चाहकर भी अपनी इच्छा को मूर्त्त रूप नहीं दे पाता |"
आचार्य श्री महाप्रज्ञजी -
" साधन चलाना सेवा का काम है,
किन्तु उससे भी बड़ी सेवा है,
शासन रुपी साधन को कुशलता से चलाना |
तुम् शासन के रथ को अच्छी तरह संचालित करते रहो |
यह सबसे बड़ी सेवा है |"
युवाचार्य श्री महाश्रमणजी -
" पूज्य श्री !
कभी-कभी मेरे मन में आता है कि अभी मैं युवा हूं,
शारीरिक रूप से सक्षम हूं |
ऐसी स्थिति में मैं खाली हाथ क्यों चलूँ ?
कुछ पुस्तक-पन्नों और उपकरणों का बोझ अपने कन्धों पर उठाकर चलूँ | "
आचार्य श्री महाप्रज्ञजी -
" जो बोझ हमारी परंपरा से चलता आया है,
वह बोझ मैं उठा रहा हूं
और
तुम्हें भी उठाना है |
इसलिए तुम अपने कन्धों को मज़बूत रखो |
युवाचार्य श्री महाश्रमणजी -
" मैं पूज्यश्री की अमृतमयी प्रेरणा को शुभाशीष के रूप में स्वीकार करता हूं |
( इसे कई बार पढ़ें | हर बार कुछ ना कुछ नई बात सामने आएगी )
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